एक जमाना था जब इस देश में सही में राज हुआ करता था। फिल्मों वाला राज नहीं, राजाओं वाला राज। उस समय देश था की नहीं, पता नहीं लेकिन राज्य जरूर थे। इसलिए उन पर राज हुआ करता था। इसलिए राजा और राजकुमार भी हुआ करते थे। वह राज्य आज की तरह बिलकुल नहीं थे। आज की तरह से मतलब आज की तरह के जनहितकारी जरा भी नहीं था। उस समय आज की तरह की ईमानदारी तो बिल्कुल नहीं थी। उस समय राजा से लेकर उसके सभी दरबारी और कर्मचारी भ्रष्ट थे। वे आज की तरह के पारदर्शी प्रशासन के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। उनके यहाँ हर फैसले बंद कमरे की बैठकों में लिए जाते थे। ये फैसले हमेशा धनी और ऊँचे तबके के हित को ध्यान में रखकर किए जाते थे। समान्य जनता से अधिक से अधिक कर वसूल किया जाता था। राज्य के खजाने को भरने के लिए आम जनता के जरूरत के सामानों की कीमत हर तिमाही में बढाई जाती थी। इसके साथ ही भोग-विलास के सामानों की कीमत हर महीने कम की जाती थी।
इस तरह राजाओं के राज में आम जनता का बहुत बुरा हाल था। जनता को हर सरकारी सेवा के लिए घूस देनी पड़ती थी और निजी सेवा के लिए ज़रूरत से ज्यादा कीमत। न्याय पाना तो टेढ़ी खीर हो गया था क्योंकि सबसे ज्यादा अन्याय न्यायालयों में हुआ करते थे। दरबारी, अधिकारी और कर्मचारी मिलीभगत से जनता के लिए बनाई गयी योजनाओं के मदों का बंदरबाँट कर लिया करते थे। शिक्षा इतनी महंगी कर दी गयी थी कि समान्य जनता के वश की बात नहीं थी। शिक्षा का माध्यम केवल अमीरों और प्रभुत्व वर्ग वालों की भाषा थी। सरकारी कामकाज भी आम जनता की भाषा में नहीं होते थे। इसका फायदा पढ़ा-लिखा तबका उठाकर, आम जनता को बेवकूफ बनाता था। धनी लोग अपना व्यापार फैलाने के लिए राज्य की जमीन को जनता के कल्याण के नाम पर नि:शुल्क लेते थे। उन पर चिकित्सालय, औषधालय, विद्यालय, खेल परिसर इत्यादि बनाने और उनमें गरीब लोगों के नि:शुल्क सेवा का वादा करते थे। लेकिन ऐसे लोग बाद में अपने वादे से मुकर जाते थे तथा व्यापारिक प्रतिष्ठान की तरह धनी और सम्पन्न वर्ग के हित के लिए चलाते थे।
राजा के दरबारी किसानों की जमीन सरकारी योजनाओं पर के नाम पर अधिग्रहित कर लिया करते थे और बाद में उसे ऊंची कीमत पर व्यापारियों और उद्योगपतियों को बेच दिया करते थे। दरबारी अपना घर भरने के लिए सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन करते थे तथा भव्य आयोजन और राज्य की प्रतिष्ठा के बहाने राज्य के धन की आपस में ईमानदारी से बंटवारा करते थे। प्राकृतिक संसाधनो को तो मंत्री अपनी बपौती समझते थे तथा राज्य सेवाओं के लिए लाइसेन्स पाना सुविधा शुल्क के बिना संभव न था। यहाँ तक की एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने का आज्ञापत्र पाने के लिए भी कर्मचारियों की जेब गरम करनी पड़ती थी। अपने ही खेत या घर को अपना साबित करने के लिए शुल्क निर्धारित थे। किसी अपराध में फसाए गए बेकसूर के लिए खुद को निर्दोष साबित करने में उसकी पूरी जिंदगी खत्म हो जाती थी और बड़े अपराधियों तथा जनसंहार करने वालों की जगह राजदरबार में पक्की हो जाती थी। इसलिए राजाओं के समय में सही में राज हुआ करता था। आज की तरह उस समय छद्म राजा, महारानी और राजकुमार तथा राज नहीं हुआ करते थे और आज की तरह की लोकप्रिय और ईमानदार व्यवस्था भी नहीं हुआ करती थी।
1 टिप्पणियाँ:
rajaon ka raj lekh ke liye sukriya avnish ji
rakeah kumargautam sub editor rajsthan patrika
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