बुधवार, 31 अगस्त 2011

अनुशासन

कई साल पहले की बात है एक स्कूल हुआ करता था। उस स्कूल में एक कक्षा लगा करती थी। उस कक्षा में शहर के केवल मनी और मसल पॉवर रखने वालों के बच्चे पढ़ सकते थे। उस कक्षा में पढ़ाने जाने की हिम्मत कोई शिक्षक नहीं करता था क्योंकि अक्सर बच्चे आपस झगड़ा किया करते थे, एक दूसरे से गालियों में बातें करते थे, वे शिक्षकों को कुछ भी कह दिया करते थे, आपस में जूता-जूता और चप्पल-चप्पल भी खेला करते थे, कभी-कभी तो पूरी कक्षा सर पर उठा लेते थे और जो शिक्षक उनकी नहीं सुनता था उसे कक्षा से बाहर अच्छी तरह से समझा देते थे।

एक बार कुछ आम छात्रों ने उनके विरोध का मन बनाया। सब एक मंच पर इकठ्ठा हुये और उनके इस व्यवहार की निंदा की। उन्हें अराजक, असभ्य और अमर्यादित कहा। कुछ ने उनके गतिविधियों की नकल कर उनकी आलोचना की। कुछ ने उन्हें जाहिल और गंवार कहा। कुछ ने उन्हें गैरजिम्मेदार बताते हुये उनको व्यवस्था के लिए घातक कहा।

इससे ताकतवर कक्षा में उत्तेजना फैल गयी। उन्हें लगा कि उनके प्रभुत्व को चुनौती दी गयी। उनके अधिकारों का हनन किया गया है। उनके गरिमा पर चोट की गयी है। वे सब एक दूसरे से लड़ते रहते थे लेकिन इस बाहरी आक्रमण के खिलाफ संयुक्त परिवार की तरह एक हो गए और तुरंत प्रधानाचार्य को सभा आयोजित करने को कहा और अपनी विशेष कक्षा की अवमानना के खिलाफ नोटिस दी तथा कड़ी कार्यवाही करने की मांग की। कुछ विद्यार्थी डर गए और उन्होंने माफी मांग ली। लेकिन कुछ अपनी बात पर अडिग रहे और उनके खिलाफ डटे रहे। ऐसे विद्यार्थियों को अनुशासन तोड़ने के अपराध में स्कूल से निकाल दिया गया।

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