सिनेमा सच का आईना होता है, सिनेमा यथार्थ का चित्रण होता है, सिनेमा समाज के बदलाव का जरिया होता है, सिनेमा कला और अभिनय का दस्तावेज़ होता है, सिनेमा केवल मनोरंजन के लिए होता है, सिनेमा समाज के लिए आदर्श होता है, सिनेमा लोगों के लिए संदेश होता है और न जाने कितने तरह के कथानक हम अपनी रोज की बहसों से खोज सकते हैं सिनेमा के बारे में। लेकिन इसमें से क्या कोई एक अकेला कथानक सिनेमा को परिभाषित कर सकने की क्षमता रखता है, इसका जवाब शायद भी हाँ में नहीं हो सकता क्योंकि इसका जवाब पूरा ना है यानि सिनेमा को हर कोई एक नजर से नहीं देखता है और सिनेमा देखने का मकसद एक दर्शक का दूसरे दर्शक से अलग होता है, फिर सिनेमा को हम कैसे परिभाषित कर सकते हैं? सिनेमा को हम उतने तरह का मान सकते हैं जीतने तरह का हम जीवन जीते हैं। जिस तरह का जीवन हम जीते हैं उस तरह के जीवन को सिनेमा बनाने को हम अपराध करार नहीं दे सकते हैं। कोई अगर किसी दुर्भावना से सिनेमा बना रहा है तो हम उससे असहमति रख सकते हैं और उसके प्रति अपना विरोध दर्ज कर सकते हैं लेकिन बिना देखे उस पर प्रतिबंध की मांग तर्कसंगत नहीं कह सकते, जैसा की पिछले दिनों प्रकाश झा की आरक्षण फिल्म को लेकर पूरे देश में प्रतिबंध का माहौल बनाने की कोशिश हुई। तीन राज्यों में यह कोशिश सफल भी हो गयी। मुझे भी डर था कि प्रकाश कहीं अपनी पिछली फिल्म राजनीति की अपरिपक्वता इस फिल्म में भी न दोहरा दें लेकिन मुझे और लोगों की तरह निर्णायक बनने की जल्दबाज़ी बिलकुल भी नहीं थी। मुझे आश्चर्य होता है जिस फिल्म में प्रकाश ने खुलेआम पिछड़े तबके के प्रतिभाशाली होने पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया था, उस पर किसी ने एक शब्द न तो लिखा और न ही एक शब्द विरोध का प्रकट किया। राजनीति में उन्होंने बड़े साफगोई से दिखा दिया कि पिछड़े घरों से राजनीति में जो नेतृत्व आता है वह कहीं न कहीं से बड़े और शाही घरानों का जूठन होता है। पिछड़े लोगों में नेतृत्व की प्रतिभा हो ही नहीं सकती बल्कि वह गलती से, भूल से, भटककर और कभी-कभी क्षणिक उन्माद में चली जाती है। आरक्षण में चाहकर भी प्रकाश वह रेखा पार नहीं कर सकते थे ,जो देश के संविधान ने खींची हुई थी। यह जानते हुये भी लोगों ने इस फिल्म पर प्रतिबंध की मांग की, जो कहीं से भी जायज नहीं थी। फिल्म में प्रकाश ने विषय के साथ या तो इंसाफ किया है या फिर उन्हें करने के लिए मजबूर होना पड़ा है क्योंकि उन्होंने जितने पूर्वाग्रहों का प्रयोग किया है, उससे ज्यादा की गुंजाइश ही नहीं बनती थी। फिल्म के अंत में वह एक समांतर संस्था की बात करते हैं जिसमें गरीब, पिछड़े और किसी भी जाति-धर्म के लोग नि:शुल्क पढ़ सकेगें। यही उनका सबसे बड़ा पूर्वाग्रह है, यहीं पर लगता है कि उन्होंने न तो भारतीय जाति व्यवस्था का सही से अध्ययन किया और न ही आरक्षण व्यवस्था का। वह आरक्षण की पूरी फिल्म का उन सतही बातों और तर्कों के साथ अंत कर देते हैं जो उत्तर प्रदेश और बिहार में रोज चाय और पान की दुकानों की होती हैं। प्रकाश को मालूम होना चाहिए था कि वे फिर से एक अलगाववाद की व्यवस्था का विकल्प दे रहे हैं। जब शैक्षिक स्तर पर ही वह अलगाव परोसने की सिफ़ारिश कर हैं तो आगे का क्या विकल्प देते? ऐसे लोगों के लिए नौकरियों का अलग विभाग लाते? गरीब और पिछड़ों को एक साथ खड़े करने का स्वप्न बेचना बहुत आसान है लेकिन उनको समाज में बराबरी का हक दिलाना बहुत मुश्किल है। एक गरीब सवर्ण को अपने जन्म की वजह से सामाजिक अलगाव का सामना नहीं करना पड़ता लेकिन एक अवर्ण को जीवन के हर मोड़ पर अपने इतिहास का बोझ ढोना पड़ता है। और प्रकाश दोनों को एक अलग समांतर संस्था में डालने की बात करते हैं। आखिर यह व्यवस्था मुख्य संस्था में क्यों नहीं हो सकती? पूरी कहानी का दोमुहाँपन यहीं उजागर हो जाता है एक तरफ वह तबेला कोचिंग सेंटर में समानता की बात करते हैं और दूसरी तरफ मुख्य शिक्षा व्यवस्था में धनी, सम्पन्न और उच्च वर्ग से अलग गरीब और पिछड़ों के लिए समांतर व्यवस्था की बात करते हैं। पिछड़ों को गरीबों के साथ जोड़कर वे आय के आधार पर आरक्षण का सांकेतिक समर्थन करते हैं लेकिन उन्होंने कभी सोचा या जानने की कोशिश की कि शिक्षा में सरकार आजादी के बाद से ही गरीबों को छात्रवृत्ति दे रही है और समाज में गरीबी दूर करने के लिए सैकड़ों परियोजनाएं चला रही है। जिस आरक्षण का विकल्प वह समांतर व्यवस्था सुझा रहे हैं, उससे आरक्षण की मुख्य वजह सामाजिक और शैक्षिक आसमानता नहीं दूर होने वाली। इसके लिए तो उन्हें समांतर अलग करने वाली नहीं बल्कि समाज में समान भागीदार और साथ बढ़ाने वाली व्यवस्था चाहिए। अब यह मकसद आरक्षण से पूरा होता हो तो आरक्षण दीजिये और किसी व्यवस्था से पूरा होता हो तो किसी और व्यवस्था के जरिये दीजिये।
उनके फिल्म का कथानक और उसका फिल्मांकन नि:संदेह जोरदार है। फिल्म के सभी पात्र और घटनाएँ बिलकुल हमारे करीब के और हमारे ही बीच के लगते हैं, इसमें मजे हुये अभिनेताओं की मौजूदगी फिल्म को निर्देशक के मनमुताबिक अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब होती है। कमजोर गीतों और धुनों के बाद भी फिल्म के संवाद फिल्म को कहीं से भी बोझिल नहीं होने देते हैं। शुरुआत एकदम जोरदार ढंग से होती है, जिसमें एक उच्च शिक्षण संस्थान प्रतिभा के बावजूद पिछड़े वर्ग के छात्र सैफ अली खान को उसके जाति और बैक ग्राउंड के आधार पर तौलने लगती है, पढ़ा लिखा वह नौजवान उनकी इस बेइज्जती को सहन नहीं करता और उनकी ही भाषा में उन्हें करारा जवाब देता है। इसे एक जोरदार दृश्य कह सकते हैं, जिसमें पूर्वाग्रह और अहंकार के बीच बदल रहे सामाजिक परिवेश को सीधे-सीधे परिभाषित किया गया है। सैफ अली खान जब अपने कॉलेज के प्रधानाचार्य अमिताभ बच्चन के पास आकर यह घटना बताता है तो वे कहते हैं कि उन्हें विश्वास नहीं होता कि वे सब इसी स्कूल में पढे हैं और उन्होंने ने उन्हें पढ़ाया है। यह एक और शुरुआती व्यंग है हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था पर कि हम पाठ्यक्रम के मुताबिक पढ़ाकर विद्यार्थियों को पास तो कर देते हैं लेकिन उन्हें शिक्षित नहीं कर पाते और भावी समाज के निर्माण के विजन तो बिलकुल नहीं दे पाते।
इसके बाद कहानी का घटनाक्रम तेजी से बदलता है। ये सब वही घटनाक्रम हैं जो हम सभी के आसपास कभी न कभी तेज या धीमे जरूर गुजरता है। न्यायालय का एक फैसला आता है और वह एक वर्ग को ज्यादा उत्साहित कर देता है तथा दूसरे वर्ग को कुछ ज्यादा ही निराश। अतिउत्साह और अतिनिराशा के इजहार से उत्पन्न संघर्ष ही फिल्म को आगे धकेलती है। सभी सरकारी संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण की उच्चतम न्यायालय की मुहर से लाभान्वित तबका जुलूस लेकर कॉलेज पहुँच जाता है और इसका विरोधी तबका उन्हें कॉलेज में घुसने नहीं देना चाहता। इनके बीच एक स्वार्थी तबका है जो इससे अपना हित यानि व्यवस्था को अपने हाथ में लेकर केवल पैसे वालों के हितों में काम करना चाहता है, इनका प्रतिनिधि है मनोज बाजपेई। ये हित जब आमने सामने होते हैं तो सारे हित एक तरफ नजर आते हैं और आरक्षण तथा उसका प्रतिनिधि सैफ अली खान एक तरफ। इसी आमने सामने में एक सवाल उठता है कि पिछड़े लोग मेहनत से इतना घबराते क्यों हैं, बराबरी के कम्पटीशन से इतना डरते क्यों हैं। उन्हें जवाब मिलता है बात अगर बराबरी के प्रतियोगिता की है तो शुरुआत की लाइन भी एक होनी चाहिए। सैफ वहाँ के सब लोगों को चैलेंज करता है कि पहले अपनी माँ को रोज सुबह उठकर बर्तन धोने के लिए भेजें, बहन को नगर निगम के दूर के नल से घड़े से पानी लेने के लिए भेजें और बाप को बोलें सुबह से शाम तक धक्के खाने वाली नौकरी करे फिर बराबरी के प्रतियोगिता की बात करें। वह उन लोगों को इतिहास भी याद दिलाता है कि पिछले 2 हजार सालों से मेहनत किसने किया है और उनके मेहनत के बल पर हराम की कमाई किसने की है? वह कहता है कि उनकी मेहनत से बनी व्यवस्था से उनके ही लोगों को सैकड़ों सालों से बाहर रखा गया और आज हम बराबर आना चाहते हैं तो यहाँ के हर तंत्र पर बैठे आप के लोग हमें बाहर का दरवाजा दिखाने में लगे हैं। यह आरक्षण हमारे लिए दरवाजे खोल रहा है तो सबको लगता उनके खिलाफ अन्याय हो रहा है। इस घमासान का परिणाम फिल्म को दुखांत बना देती है। अमिताभ पर पक्षपात करने, जातिवादी होने, आरक्षण के विरुद्द होने, आरक्षण के साथ होने जैसे अलग अलग तरह के आरोप लगते हैं। आरक्षण के खिलाफ रहे एक छात्र को कॉलेज से निकाल दिया जाता है, सैफ शोध के लिए अमेरिका चला जाता है, अमिताभ एक अखबार संवादता के को दिये बयान में फंस जाते हैं और उन्हें इस्तीफा के साथ अपने घर से भी हाथ धोना पड़ता है। इन सबसे फायदा उठाता है पूँजी के लिए काम करने वाला मनोज बाजपेई, जिसके केके कोचिंग पर लगाम कसने की कोशिश की थी अमिताभ ने। इसके बाद पूरी फिल्म शिक्षा के बाजरीकरण पर आकर खड़ी हो जाती है। केके कोचिंग की चुनौती और अपने घर को पाने के लिए अमिताभ तबेला कोचिंग शुरू करते हैं और उनकी इस मुहिम उनका साथ देता है हर वह इंसान जो उनसे जुड़ा होता है। अपने रात दिन के परिश्रम से वह साबित कर दिखा देते हैं कि सच्ची शिक्षा के सामने कोई आरक्षण और कोई बाजार नहीं टिक सकता है। इस तरह उन्होंने अपने लगाए पौधों की बदौलत केके कोचिंग के तबेला कोचिंग को गिरने के मंसूबे को तो ध्वस्त कर देते हैं लेकिन वह न तो शिक्षा के बाजारीकरण को रोकने का उपाय बता पाते हैं और न आरक्षण का कोई तर्कसंगत विकल्प दे पाते हैं। इस तरह से यह फिल्म समाज में मौजूदा चल रही उच्च शिक्षा की समस्याओं और विचारधाराओं के विभिन्न पक्षों का जोरदार फिल्मांकन है। हमें फ़िल्मकार के ऊपर विकल्प या संदेश देने का दबाव नहीं बनाना चाहिए और न ही उसके दिये गए विकल्प को आखिरी सत्य मानना चाहिए। अगर हम उसके विकल्प से सहमत हैं सहमति व्यक्त करनी चाहिए और असहमत हैं तो असहमति व्यक्त करनी चाहिए लेकिन दोनों ही हालातों में कम से कम ऐसे आसाधारण विषय पर शानदार फिल्म बनाने की काबलियत को कम से कम एक बार सलाम जरूर करना चाहिए।
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