बुधवार, 17 अगस्त 2011

चमकी रो उठी फिर से

चमकी रो उठी फिर से
महज दो निवाले के लिए
रोटी हो, भात हो
या थोड़ी सी सब्जी हो
या सब्जी जैसी घास हो
कुछ न सही
चावल की मांड ही हो
बड़ा अजीब है
उसे दूध नहीं चाहिए
बड़े बड़े दुकानों में
वह गयी ही नहीं
प्रोटीन और विटामिन से भरपूर
उत्पादों के बारे में सुना भी नहीं
चौराहे पे लगे फलों को देखा
अपने ललचाते मन से
निगाहें माँ के चेहरे पर की
और हिकारत से फलों को देखा
फिर पकड़ माँ की उँगली
घर चल दी
घर क्या होता है
चमकी को मालूम नहीं
उसके लिए ईंटों की बेतरीब जोड़ पर
पुआल से बना छप्पर ही
घर है
स्कूल के बारे में
उसने केवल सुना भर है
वह भी तब
जब गाँव गयी थी
उसके लिए स्कूल वह है
जहाँ दोपहर को
पेट भर खाना मिलता है
शहर में उसके लिए
कोई स्कूल नहीं
इसलिए उसके लिए
पेट भरना दूर की बात है
कपड़े नए भी होते हैं
कपड़े खरीदे भी जाते हैं
इसका अहसास भी नहीं उसे
कपड़े मिट्टी से साफ होते हैं
गंदे नहीं
जाना है उसने
अपनी माँ से यही
वह देखती है
टकटकी लगाए
आती जाती गाड़ियों को
रेलों को और
आसमान में उड़ते यान को
ये सब उसके समझ से परे हैं
माँ कुछ कुछ समझती है
लेकिन वह समझा कर
उसे बहकाना नहीं चाहती
वह सोचती है क्या समझाए
यह कि क्यों नहीं जल पाता है
रोज रोटी के लिए चूल्हा
या यह कि क्यों नहीं आ पाते
उसके पापा घर हर रोज
कि यह कैसे औरों के घर में
पकता है इतना खाना
यह कि कैसे भर लेते हैं
जानवर तक अपना पेट
और चमकी के लिए
नसीब नहीं होते हैं दो कौर।





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