मंगलवार, 15 मार्च 2011

जिंदगी कुछ और नहीं इंतजारखाना है




जब से नहीं कहीं आना जाना है

जिंदगी कुछ और नहीं इंतजारखाना है

मंदिर बनायें की मस्जिद

सोचते सोचते ये उम्र निकल गयी

सच का पता बहुत बाद में चला

जन्नत का असली रास्ता तो मैखाना है

आज फिर से इस मोड़ पर हूँ

किसी से मोहब्बत की जाये

मगर उन यादों का क्या करूँ

जिनका रोज दिल की गली में आना जाना है

बहुत दिन बाद गया था अपने घर

सोचा की घर का ही होकर रह जाऊँ

पता सच का चला तो कदम वापस हो लिए

वजूद अपना बस दौलतखाना है

पढ़ने का मन अब भी बहुत करता है

स्कूल होकर आया

तब से मन में बहुत सन्नाटा है

वहाँ भी खरीदने-बेचने का लगा तांता है

दिल में कसक सी रहती है

समाज के कुछ काम आया जाए

कदम उठाए तो वापस खींचने पड़े

खुद के उनके ख्वाब बड़े वहशियाना हैं

उसका ख्याल आया तो

शरीर का कतरा-कतरा निचुड़ गया

आखिर क्यों मैं इतना बेमुर्वत हो गया

ख्वाब तो उसको हर हाल में पाना था

1 टिप्पणियाँ:

sonal ने कहा…

SIMPLY AMAZING.................