जब से नहीं कहीं आना जाना है
जिंदगी कुछ और नहीं इंतजारखाना है

मंदिर बनायें की मस्जिद
सोचते सोचते ये उम्र निकल गयी
सच का पता बहुत बाद में चला
जन्नत का असली रास्ता तो मैखाना है
आज फिर से इस मोड़ पर हूँ
किसी से मोहब्बत की जाये
मगर उन यादों का क्या करूँ
जिनका रोज दिल की गली में आना जाना है
बहुत दिन बाद गया था अपने घर
सोचा की घर का ही होकर रह जाऊँ
पता सच का चला तो कदम वापस हो लिए
वजूद अपना बस दौलतखाना है
पढ़ने का मन अब भी बहुत करता है
स्कूल होकर आया
तब से मन में बहुत सन्नाटा है
वहाँ भी खरीदने-बेचने का लगा तांता है
दिल में कसक सी रहती है
समाज के कुछ काम आया जाए
कदम उठाए तो वापस खींचने पड़े
खुद के उनके ख्वाब बड़े वहशियाना हैं

उसका ख्याल आया तो
शरीर का कतरा-कतरा निचुड़ गया
आखिर क्यों मैं इतना बेमुर्वत हो गया
ख्वाब तो उसको हर हाल में पाना था
1 टिप्पणियाँ:
SIMPLY AMAZING.................
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