इक्कीसवीं सदीं का पहला दशक करीब-करीब बीतने को है। इस प्रकार छः दशक से भी अधिक का समय हमने अपने तथाकथित स्वशासन में जीने के भ्रम में बिताया है। आजादी के इतने साल बाद भी लोकतंत्र की बुनियाद गुलामी की अनेक जंजीरों से जकड़ी दिखायी देती है। समझ में नहीं आता आखिर ये किसका और कैसा भ्रम है कि हम आजाद हैं और आजाद देश में जी रहे हैं। इस देश की रुह और आबोहवा से पर्त दर पर्त गुजरते जाइये, आपको समझ में आता जायेगा कि जिसे आप आजादी का खुशनुमा एहसास समझ रहे हैं, वह कुछ और नहीं बल्कि खान के हाथों से छूटकर पठान के हाथों में फॅंसने जैसा है। एक गुलाम मानसिकता इस कदर हावी है कि हम एक परिवार को राजा की तरह पूंजते आ रहे हैं। उसके परिवार के आजादी की लड़ाई में शरीक होने का एहसान है कि चुकने का नाम ही नहीं लेता। एक पार्टी को उस परिवार ने अपनी जागीर बना रखी है और उस पार्टी के सत्ता लोलुप नेता उस परिवार के आने वाले हर बच्चे को कंघे पर बैठाकर शू शू करवाने का लंबा इंतजार करते हैं। यह परिवार लोकतंत्र का ढ़ोंग करता है और ऐसे लोंगो को अपने सत्ता की चाभी बनाता है जो दाँत और नाखून से विहिन होते हैं। राजनैतिक प्रखरता या दल की नीतियों को आगे बढ़ाने में आप योग्य हैं लेकिन पारिवारिक निष्ठा पर आप खरे नहीं उतरते तो इस दल में आप की कोई जगह नहीं है। यहाँ पर जिम्मेदारी सौंपी नहीं जाती बल्कि उपहार में दी जाती है। इस परिवार की घिनौनी राजनीति का कोढ़ का देश की हर पार्टी में फैलने लगा और आलम यह है कि आज देश की जनता को गमराह किया जा रहा है कि देश में युवा नेतृत्व आ रहा है। किसे नहीं पता कि यह युवा नेतृत्व नहीं परिवार नेतृत्व है। आज सामान्य परिवार के बच्चों का राजनीति में आना दुःस्वप्न हो गया है। पूँजीवाद के वर्चस्व ने नेतृत्व के आदर्श को खत्म करके रख दिया है। नेतृत्व का मतलब पूँजी से हो गया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बाकी राजनीतिक दलों ने भी कोई विकल्प नहीं दिया। एक दल तो देश की सारी समस्यायें और मुद्दें छोड़कर धर्म की राजनीति करने में लगा रहा। बाकी दल उभरे तो समाजवाद के नाम पर लेकिन परिवार के पूँजीवाद और जाति के दुष्चक्र से बाहर न निकल सकें। पहले तो भारत एक एक रंग की गुलाम मानसिकता में जी रहा था लेकिन आज बहुरंगीय गुलामी की और उसे किससे आजादी पानी है लेकिन आज समझ नहीं पा रहा है गुलामी की इतनी जंजीरों में से कौन सी किसकी है और उसे किससे मुक्ति पानी है।
गुलामी राजनीतिक से ज्यादा आर्थिक है। ये आर्थिक गुलामी पूरे समाज को पंगू बना दे रही है। जब तकनीकी आती है तो अपने साथ कारोबार का जो खेल लाती है वह तकनीकी विकसित करने वाले देश का पक्ष लेती है, यह तकनीकी लेने वाले देश पर निर्भर करता है कि वह अपने पर्यावरण, संसाधनों और संस्कृति को ध्यान में रखकर तकनीकी हासिल करता है अथवा केवल अंधानुकरण करता है जैसा कि भारत ने किया है। इसी अंधानुकरण का परिणाम है कि आज देश असंतुलित विकास की समस्या से जूझ रहा है। कुछ नगर और शहर ऐसे हैं जो इतने विकसित हो गये हैं कि पूरा देश उनकी चकाचैंध में खींचा चला आ रहा है, दूसरी तरफ हजारों-हजार गाँवों की हालत यह है कि वहाँ रहने वाले लोगों को दो जून की रोटी नसीब नहीं हो पा रही है। आज हालात यह हैं कि जिस गति से देश में करोड़पतियों और अरबपतियों की संख्या तो बढ़ रही है, उससे कई गुना अधिक गति से गरीबों की तादाद बढ़ रही है। एक देश जिसकी करीब दो तिहाई जनता रोज केवल 20 रूपया आय पर गुजारा करती है, उस देश के सांसदों और विधायकों का एक दिन का खर्च लाखों में होता है।सरकार पर पैसे वालों का दबदबा है और पैसे वालों के आगे लगभग हर व्यवस्था और हर कानून दण्डवत हो जाती है।गुनाह और सजा से रिश्ता सिर्फ ऐसे लोगों का है जिनके पास पैसा नहीं है, जिनका कोई रसूख नहीं है और जो लाख मेहनत करके भी जिन्दगी भर गरीबी का जीवन जीने को अभिशप्त है।
आज देश उनकी पीढ़ीयों का हो गया जो अंग्रेजों के जमाने में उनके तलवे चाटा करते थे। ऐसे लोगों की पूरी जमात का देश के अधिकारीतंत्र पर कब्जा रहा। हालात आज भी बहुत ज्यादा नहीं बदले हैं कुछ प्रतिशत बदलाव को छोड़ दें तो आज भी गाँव से निकलकर ऐसे सिस्टम में पहुँचने वाले उदाहरण के तौर गिने जाते हैं। देश आजाद हो गया लेकिन उनके साथ आजाद हुए केवल अमीर और रईस लोग, किस सरकार में दम है कि इनके हितों के खिलाफ जाकर भूमि सुधार लागू कर सके। नक्सल के खिलाफ गोली उगलने वाली सरकार बता सकती है, क्यों उसके अपने ही देश के नागरिक देश के भीतर देश की मांग कर रहे हैं। अगर मान भी लें आज नक्सल का मकसद बदल गया है और इसका नेतृत्व गलत हाथों में है तो अमीरों का पैर दबा-दबाकर गरीबों के इस जख्म को नासूर किसने बनने दिया। जो सरकार हकों का बंटवारा करने के नाम पर केवल और केवल गरीबों का हक छीनकर अमीरों में बांटती हो उसके खिलाफ हथियार उठाने वाले किस बिना पर गलत कहे जा सकते हैं। उजाड़े जाते हैं जंगल, गाँव और झुग्गियों में रहने वाले लेकिन आलीशान महल मिलते हैं करोड़ों चुकाने वाले को।बिजली मिलती है उनको जो वातानुकुलन का प्रयोग कर वैश्विक ताप बढ़ाने का काम करते हैं और जिनका ठंड में पानी गरम न हो तो वे ट्वायलेट भी नहीं जा सकते। सरकारी काम तो चोरी और निजी कंपनी हुई तो मुनाफा और आम जनता खाती है दोनों तरफ से मुँहका। जिन्होंने हाल ही में रिलिज फिल्म वेल डन अब्बा देखी है, उनके लिए यह समझना बड़ा ही सहज है कि किस तरह हमारे सामने से हमारी अचल सम्पत्ति चोरी हो रही है और हम बैठकर इंतजार कर रहे हैं कि विदेश से कोई गाँधी आयेगा और इस आजादी की गुलामी के विरोध में आवाज उठायेगा।
यह समय ऐसा है जब कि पूरा का पूरा देश हताश है और उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि करे तो क्या करे ? कागजों पर साक्षरता बढ़ रही है और प्रसारण के बढ़ते खर्च बता रहे हैं कि अंधविश्वास किस तेजी से खत्म हो रहा है लेकिन हकीकत में लोगों के जीवन स्तर में सुधार की गति बहुत धीमी है और अंधविश्वास का आलम यह है कि रोज किसी की बलि ली जा रही है तो किसी का अंग भंग कर दिया जा रहा है। इन सारे पहलुओं में कानून केवल तमाशा देखता है। सरकार को इस बात की चिंता है कि समलैंगिक विवाह को मान्यता कैसे दिलायी जाय लेकिन उसे इस बात की जरा भी परवाह नहीं है कि जाति और मज़हब के नाम पर कत्ल किये जा रहे जोड़ों की सुरक्षा कैसे की जाय। ऐसा कौन सा उपाय किया जाय कि धर्म और जाति के बीच की दीवार टूट जाय।
भ्रष्टाचार का कोढ़ है कि रूकने का नाम ही नहीं लेता। सेना, राजनीति, न्यायालय, खेल, शिक्षा कुछ भी ले लो व्यवस्था का हर हिस्सा सड़ चुका है। प्रोफेसर बनना है जेब में दाम होना चाहिए और साथ में रसूख भी। अच्छी जगह एडमिशन चाहिए तो अच्छा जुगाड़ और ऊॅंचा डोनेशन साथ में रखिये। न्याय चाहिए तो उसको खरीदने की ताकत होनी चाहिए। राजनीति में बाहुबल और धनबल के बिना सफल हो पाना बहुत मुश्किल है। सेना में अच्छे पद का लाभ यह है कि आप हथियार की दुकान खोल लीजिये और यह थोड़ा मुश्किल लगे तो जवानों के राशन, कपड़े और कफन का सौदा शुरू कर दीजिये। खेल का आलम यह है कि यह अब धंधेबाजों के निवेश का सबसे सुरक्षित क्षेत्र है और सरकारी दलालों के दलाली खाने की सबसे मुफीद जगह। देह व्यापार का भी यह अड्डा बनने लगा है। और कॉमनवेल्थ के नाम पर देश के कॉमनवेल्थ की जो ऐसी की तैसी की जा रही है, उसका परिणाम आने वाले कई वर्षों तक देश की जनता को भुगतना पड़ेगा। हालात जब अभी बर्दाश्त से बाहर हो रहे हैं तो आगे की कहानी कितनी भयानक होगी, इसका अभी अंदाजा लगा पाना बहुत मुश्किल है।
गुलामी राजनीतिक से ज्यादा आर्थिक है। ये आर्थिक गुलामी पूरे समाज को पंगू बना दे रही है। जब तकनीकी आती है तो अपने साथ कारोबार का जो खेल लाती है वह तकनीकी विकसित करने वाले देश का पक्ष लेती है, यह तकनीकी लेने वाले देश पर निर्भर करता है कि वह अपने पर्यावरण, संसाधनों और संस्कृति को ध्यान में रखकर तकनीकी हासिल करता है अथवा केवल अंधानुकरण करता है जैसा कि भारत ने किया है। इसी अंधानुकरण का परिणाम है कि आज देश असंतुलित विकास की समस्या से जूझ रहा है। कुछ नगर और शहर ऐसे हैं जो इतने विकसित हो गये हैं कि पूरा देश उनकी चकाचैंध में खींचा चला आ रहा है, दूसरी तरफ हजारों-हजार गाँवों की हालत यह है कि वहाँ रहने वाले लोगों को दो जून की रोटी नसीब नहीं हो पा रही है। आज हालात यह हैं कि जिस गति से देश में करोड़पतियों और अरबपतियों की संख्या तो बढ़ रही है, उससे कई गुना अधिक गति से गरीबों की तादाद बढ़ रही है। एक देश जिसकी करीब दो तिहाई जनता रोज केवल 20 रूपया आय पर गुजारा करती है, उस देश के सांसदों और विधायकों का एक दिन का खर्च लाखों में होता है।सरकार पर पैसे वालों का दबदबा है और पैसे वालों के आगे लगभग हर व्यवस्था और हर कानून दण्डवत हो जाती है।गुनाह और सजा से रिश्ता सिर्फ ऐसे लोगों का है जिनके पास पैसा नहीं है, जिनका कोई रसूख नहीं है और जो लाख मेहनत करके भी जिन्दगी भर गरीबी का जीवन जीने को अभिशप्त है।
आज देश उनकी पीढ़ीयों का हो गया जो अंग्रेजों के जमाने में उनके तलवे चाटा करते थे। ऐसे लोगों की पूरी जमात का देश के अधिकारीतंत्र पर कब्जा रहा। हालात आज भी बहुत ज्यादा नहीं बदले हैं कुछ प्रतिशत बदलाव को छोड़ दें तो आज भी गाँव से निकलकर ऐसे सिस्टम में पहुँचने वाले उदाहरण के तौर गिने जाते हैं। देश आजाद हो गया लेकिन उनके साथ आजाद हुए केवल अमीर और रईस लोग, किस सरकार में दम है कि इनके हितों के खिलाफ जाकर भूमि सुधार लागू कर सके। नक्सल के खिलाफ गोली उगलने वाली सरकार बता सकती है, क्यों उसके अपने ही देश के नागरिक देश के भीतर देश की मांग कर रहे हैं। अगर मान भी लें आज नक्सल का मकसद बदल गया है और इसका नेतृत्व गलत हाथों में है तो अमीरों का पैर दबा-दबाकर गरीबों के इस जख्म को नासूर किसने बनने दिया। जो सरकार हकों का बंटवारा करने के नाम पर केवल और केवल गरीबों का हक छीनकर अमीरों में बांटती हो उसके खिलाफ हथियार उठाने वाले किस बिना पर गलत कहे जा सकते हैं। उजाड़े जाते हैं जंगल, गाँव और झुग्गियों में रहने वाले लेकिन आलीशान महल मिलते हैं करोड़ों चुकाने वाले को।बिजली मिलती है उनको जो वातानुकुलन का प्रयोग कर वैश्विक ताप बढ़ाने का काम करते हैं और जिनका ठंड में पानी गरम न हो तो वे ट्वायलेट भी नहीं जा सकते। सरकारी काम तो चोरी और निजी कंपनी हुई तो मुनाफा और आम जनता खाती है दोनों तरफ से मुँहका। जिन्होंने हाल ही में रिलिज फिल्म वेल डन अब्बा देखी है, उनके लिए यह समझना बड़ा ही सहज है कि किस तरह हमारे सामने से हमारी अचल सम्पत्ति चोरी हो रही है और हम बैठकर इंतजार कर रहे हैं कि विदेश से कोई गाँधी आयेगा और इस आजादी की गुलामी के विरोध में आवाज उठायेगा।
यह समय ऐसा है जब कि पूरा का पूरा देश हताश है और उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि करे तो क्या करे ? कागजों पर साक्षरता बढ़ रही है और प्रसारण के बढ़ते खर्च बता रहे हैं कि अंधविश्वास किस तेजी से खत्म हो रहा है लेकिन हकीकत में लोगों के जीवन स्तर में सुधार की गति बहुत धीमी है और अंधविश्वास का आलम यह है कि रोज किसी की बलि ली जा रही है तो किसी का अंग भंग कर दिया जा रहा है। इन सारे पहलुओं में कानून केवल तमाशा देखता है। सरकार को इस बात की चिंता है कि समलैंगिक विवाह को मान्यता कैसे दिलायी जाय लेकिन उसे इस बात की जरा भी परवाह नहीं है कि जाति और मज़हब के नाम पर कत्ल किये जा रहे जोड़ों की सुरक्षा कैसे की जाय। ऐसा कौन सा उपाय किया जाय कि धर्म और जाति के बीच की दीवार टूट जाय।
भ्रष्टाचार का कोढ़ है कि रूकने का नाम ही नहीं लेता। सेना, राजनीति, न्यायालय, खेल, शिक्षा कुछ भी ले लो व्यवस्था का हर हिस्सा सड़ चुका है। प्रोफेसर बनना है जेब में दाम होना चाहिए और साथ में रसूख भी। अच्छी जगह एडमिशन चाहिए तो अच्छा जुगाड़ और ऊॅंचा डोनेशन साथ में रखिये। न्याय चाहिए तो उसको खरीदने की ताकत होनी चाहिए। राजनीति में बाहुबल और धनबल के बिना सफल हो पाना बहुत मुश्किल है। सेना में अच्छे पद का लाभ यह है कि आप हथियार की दुकान खोल लीजिये और यह थोड़ा मुश्किल लगे तो जवानों के राशन, कपड़े और कफन का सौदा शुरू कर दीजिये। खेल का आलम यह है कि यह अब धंधेबाजों के निवेश का सबसे सुरक्षित क्षेत्र है और सरकारी दलालों के दलाली खाने की सबसे मुफीद जगह। देह व्यापार का भी यह अड्डा बनने लगा है। और कॉमनवेल्थ के नाम पर देश के कॉमनवेल्थ की जो ऐसी की तैसी की जा रही है, उसका परिणाम आने वाले कई वर्षों तक देश की जनता को भुगतना पड़ेगा। हालात जब अभी बर्दाश्त से बाहर हो रहे हैं तो आगे की कहानी कितनी भयानक होगी, इसका अभी अंदाजा लगा पाना बहुत मुश्किल है।
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