
समय, धन और प्रबन्धन एक तिराहे पर टकरा गये। उनके बीच सबसे पहले जाने को लेकर विवाद हो गया। समय बोला मैं सबसे अधिक महत्व रखता हूँ और सबसे पहले मेरे जाने का नैतिक अधिकार बनता है। इस पर धन ने प्रतिवाद किया कि उसके बिना समय का क्या मोल, इसलिए उसे पहले जाने का अवसर उसे मिलना चाहिए। इस पर प्रबन्धन उसकी लगभग हॅंसी उड़ाते हुए बोला, ”कुछ तो शर्म करो। मेरे सामने ऐसी बातें करते हो। मेरे बिना तुम दोनों का कोई अस्तित्व भी है। चलो हटो रास्ता दो और तुम दोनों मेरे पीछे-पीछे आओ।“ तीनों में से कोई हार मानने को तैयार नहीं दिख रहा था और न ही कोई टस से मस हो रहा था। पीछे ट्रैफिक बढ़ता जा रहा
इस पर समय बोला, ”देखा बन्धुओं, मेरा प्रताप। जैसे-जैसे मैं अतीत होता जाऊँगा, वैसे-वैसे ट्रैफिक बढ़ता जायेगा। मेरे रूकने मात्र से तुम दोनों की सारी महत्ता धरी रह गयी है। न तो इतना धन खर्च करके तैयार की गयी यातायात प्रणाली काम कर रही है, न ही लम्बे अरसे के अनुभवों से तैयार तुम्हारा प्रबन्धन कुछ करके दिखा पा रहा है। देखो-देखो मेरे रूकने मात्र से लोगों के माथे पर किस तरह बल पड़ रहे हैं और लोग होने वाले नुकसान को सोचकर किस तरह पसीने-पसीने हो रहे हैं। वो देखो उस उद्योगपति को किस तरह से इधर-उधर शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन हिला रहा है, उसकी आधे घण्टे बाद जर्मनी के लिए फ्लाइट है और अगर उसकी फ्लाइट मिस हो गयी तो करोड़ों रूपये की एक कंपनी उसके हाथ से निकल जायेगी। उधर देखो आज उसका एक बड़ी नौकरी के लिए साक्षात्कार है और अगर वह एक घण्टे में न पहुंचा तो उसके हाथ से एक और अवसर फिसल जायेगा। वह एक कंपनी का मैनेजर, उसके पास शाम तक करोड़ो का आर्डर पूरा करने का जिम्मा है, अगर वह समय से न पहुंचा तो उसकी कंपनी के हाथ से कांट्रैक्ट जायेगा और उसके हाथ से नौकरी। इसी तरह भीड़ में हर कोई अपना-अपना समय लेकर निकला है लेकिन तुम दोनों अपनी हठधर्मिता के चक्कर में इतने लोगों के भविष्य से खेल रहे हो।“
मगर धन हार मानने को तैयार न था। वह बोला, ”किसी के समय की हैसियत का अंदाजा उसके पास मेरे होने और न होने पर निर्भर करता है। अगर मेरी चाह न हो तो समय की कद्र करने की जरूरत ही क्या है और प्रबन्धन की जरूरत तो इसीलिए पड़ती ही है कि समय का सही सदुपयोग कर अधिक से अधिक धन कमाया जा सके। अब इस भीड़ में जितने भी लोग जल्दी में हैं, सबका अंतिम लक्ष्य तो मैं ही हूँ । चाहे वह सामने साइकिल सवार दिहाड़ी मजदूर हो या फिर पीछे चमचमाती वातानुकूलित कार में बैठा किसी कंपनी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी हो। इसलिए समय और प्रबन्धन तो मुझे प्रबन्धित करने के साधन मात्र है, साध्य तो मेरा प्रबन्ध करना है, इसलिए तो कहा जाता है कि समय का प्रबन्धन, मेरा यानि धन का प्रबन्धन है। इसलिए मैं ही मुख्य हूँ, विवाद खत्म करो और मुझे रास्ता दो।“
इससे पहले प्रबन्धन कुछ कह पाता कि समय बीच में ही बोल उठा, “सही कहा मित्र धन आपने, समय यानि मेरा प्रबन्धन ही आपका प्रबन्धन है। फिर तो इससे यही साबित होता है कि मेरे प्रबन्धन पर आपका प्रबन्धन निर्भर करता है। आप जरा गौर फरमा लो, छात्र और छात्राओं ने सब-कुछ पढ़ रखा है लेकिन परीक्षा हाल में मेरा प्रबन्धन भूल गये तो ?, कंपनी ने भारी पूँजी लगाकर मंहगी तकनीकी हासिल की है लेकिन उत्पादन और आपूर्ति में मेरा प्रबन्धन न किया तो, ? बडे़-बड़े अस्त्र-शस्त्र हैं हमारी सेना के पास लेकिन हम घुसपैठ के समय के आकलन और की रणनीति में मेरी यानि समय की चूक कर गये तो जो विफलता हासिल होती है, वह आपको खोने से कहीं ज्यादा घाव देती है। आपको और याद दिला दूं सरकार ने लाख बजट बना लिया हो और लाख परियोजनाओं के प्रबन्धन की रणनीति बना ली हो, अगर उनके समय पर पूरा करने की कारगर रणनीति नहीं होती तो न सिर्फ धन की कई गुना और बलि चढ़ानी होती है बल्कि सरकार गिरने तक की नौबत आ जाती है। इसका मतलब जानते हैं आप, जनता की करोडों रूपये की कमाई का सत्यानाश। यही नहीं जो कार्यालय या व्यक्ति मेरा सही प्रबन्धन नहीं करता, वह अपनी मानवीय और सामाजिक पूँजी भी खो देता है।”
धन और प्रबन्धन को खामोश देखकर समय ने अपनी बात आगे बढ़ायी, ” मित्र धन हमें कम से कम प्रबन्धन की इस बात के लिए शुक्रगुजार तो होना ही चाहिए कि वह तिहरी भूमिका का निर्वाह करता है। धन के लिए मेरा, मेरे लिए धन का और खुद यानि प्रबन्धन के लिए हम दोनों का प्रबन्ध करता है। इस तरह से बिना उचित प्रबन्धन के तो मेरा भी अस्तित्व नहीं होगा और अगर सही तरह से मेरा प्रबन्धन नहीं होगा तो तुम्हारी तादाद कितनी भी ज्यादा क्यों न हो, तुम ज्यादा समय तक बने नहीं रह सकते और प्रबन्धन भी खुद अपने लिए हम दोनों के प्रबन्धन की समुचित व्यवस्था नहीं कर पायेगा। इसीलिए खुले दिमाग से सोचने की जरूरत है कि मैं यानि समय है तो प्रबन्धन है, प्रबन्धन है तो धन है और धन है तो मेरा और बेहतर प्रबन्ध कर और अधिक धन का प्रबन्ध किया जा सकता है।“
बहुत देर से खोमोश बैठा प्रबन्धन बड़े ही गम्भीर लहजे में बोला, ”मित्र धन, समय सही कह रहा है कि उसके सही प्रबन्धन के बिना न तो तुम्हारा अस्तित्व है और न ही मेरा। सच तो यही है कि अगर मेरा प्रबन्धन खुद सही समय पर न हो तो न तो मैं समय का उचित प्रबन्ध कर पाऊँगा और न ही तुम्हारा। भले ही मेरी भूमिका केन्द्रीय है लेकिन तुम्हारी तरह मैं भी समय पर ही निर्भर करता हूँ । इस सत्य से न तो तुम इन्कार कर सकते हो और न मैं कि कितनी भी पूँजी लगा दी जाय और कितनी ही बड़ी कुशल प्रबन्धन टीम क्यों न हो, अगर समय के अनुपालन थोड़ी सी चूक हो जाय तो धन, श्रम और जीवन तीनों की हानि तय है।“
प्रबन्धन की अपील से धन पुर्नविचार की मुद्रा में आ गया और बोला, ” मित्र प्रबन्धन, मैं सच में बहक गया था और खुद को सबसे बड़ी ताकत समझने लगा था। मैं तो यह भूल ही गया था कि मेरा अस्तित्व और प्रबन्धन दोनों समय के उचित प्रबन्धन पर निर्भर करता है। आप दोनों ने मिलकर मुझे वास्तविकता से अवगत कराया, इसके लिए मैं सदैव आप दोनों का आभारी रहूँगा। सच में दुनिया में लोग मुझे इतना महत्व देते हैं कि जैसे मैं ही सब कुछ हूँ । अगर समय और प्रबन्धन को लोग यथोचित महत्व दें तो मैं खुद-ब-खुद उनके पास दिन दूनी रात चैगुनी वृद्धि करूँगा।“
इतना कहकर धन ने समय और प्रबन्धन को रास्ता दिया तो समय और प्रबन्धन ने उसे रोका और एक साथ बोले, ”मित्र धन, क्या तुम्हें नहीं लगता कि हम तीनों को एक साथ और एक दिशा में चलना चाहिए, आखिर हमारी अर्थवत्ता एक साथ होने में है। जब तक हम एक साथ और एक सही दिशा में नहीं होगें तब तक हम किसी व्यक्ति या संगठन का उसी तरह से नुकसान करते रहेगें, जैसे इस तिराहे पर ट्रेफिक रोककर हजारों लोगों का कर रहे हैं।“
इतना कहकर तीनों एक साथ और एक दिशा में बाहों में बाहें डालकर चल दिये और चल पड़ी रूकी हुई ट्रैफिक भी।
2 टिप्पणियाँ:
दुनिया में हर चीज का अपना महत्व तो है ही!!
यार शानदार लिखा है....बहुत खूब.....शानदार...ऐसे ही चलते रहो मेरे दोस्त
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