सोमवार, २८ सितम्बर २००९

शोषण के खिलाफ मदद करें

दिल्ली में एक आम नागरिक का जीना किस तरह मुहाल है, इसकी नजीर के उमा मूर्ति हैं। उमा ने 1 लाख 85 हजार रूपये दिल्ली के एक बिल्डर को मुम्बई में प्लाट के लिए भुगतान किये थे। करीब तीन साल होने को हैं, बिल्डर ने न तो प्लाट ही दिया है और न ही भुगतान राशि वापस कर रहा है। उमा ने 22 फरवरी 2007 को क्रमशः 300 वर्ग मीटर प्लाट के लिए स्टेट बैंक आॅफ इण्डिया के ड्राफ्ट संख्या-765343 के जरिये 69375 रूपये और 500 वर्ग मीटर प्लाट के लिए स्टेट बैंक आॅफ इण्डिया के ड्राफ्ट संख्या-765348 के जरिए 115625 रूपये का भुगतान किया। इसके बदले उमा ने बिल्डर से उसके प्रतिष्ठान श्री जी नेस्टबिल्ड प्राइवेट लिमिटेड की क्रमशः रसीद संख्या 177 और 178 प्राप्त की है। इस प्रतिष्ठान का पता है - सी-120, प्रीत विहार, दिल्ली-110092। प्रतिष्ठान से प्राप्त बिल पर निम्नलिखित मोबाइल नम्बर लिखे हैं - 9811523983, 9312258368, 9810750677, 9312213259। इन नम्बरों पर बात करने पर कभी राकेश अग्रवाल फोन उठाते हैं तो कभी उसके बेटे। उनके जवाब टालने-मटोलने और परेशान करने वाले होते हैं, जैसे मैं राकेश अग्रवाल नहीं बोल रहा हूॅं, अच्छा आपने जहाॅं से बुकिंग करायी थी वहाॅं बात करिये, अच्छा ठीक है आप एक घण्टे बाद फोन करिए, इस महीने मेरी बेटी की शादी थी तो हाथ तंग है, अगले हफ्ते मिल जायेगा इत्यादि। ऐसे जवाब सुनते-सुनते उमा थक चुकी हैं और निराश भी हो चुकी हैं, शायद कुछ दिन ऐसा ही और चला तो उमा अपनी कंपनी से होम लोन लेकर दिये गये पैसे को पाने की उम्मीद भी छोड़ देगी, जिसका ब्याज उनके वेतन से महीने दर महीने कटता जा रहा है।
पत्रकार साथियों से अनुरोध है कि उमा की इस समस्या को प्रकाशित या प्रसारित कर उनकी मदद करें ताकि उनके जैसे और भी लोगों को ऐसे बिल्डरों के चंगुल से अपनी गाढ़ी कमाई वापस पाने का रास्ता बन सके।
उमा मूर्ति से इस नंबर पर संपर्क किया जा सकता है ... 9818644322

गुरुवार, १० सितम्बर २००९

जाना होगा धनतंत्र की इस शिक्षा को




कलम तोड़कर
रख दी स्याही हाथ में
कहते है अब तकदीर लिखो
कल के हिंदुस्तान की
गवाह इतिहास है
दौलत की ताकत से
हूकुमत नहीं चला करती
दुनिया का रुख
हो जाता है उस तरफ
चल पड़ता है जिधर
गरीब, किसान, नौजवान और छात्र
देश है इनका
शिक्षा है इनकी
इसका व्यापार नहीं चलेगा
मानवता के पथ की शाला पर
इस तरह से धनवानों
को राज नहीं होगा
जाना होगा धनतंत्र की इस शिक्षा को
क्योंकि लोकतंत्र के असली वारिस
सामने आने लगे हैं
और तोड़ देगें
बाज़ार का ये कुचक्र
भरोसा दिलाने लगे हैं.


























मंगलवार, ८ सितम्बर २००९

सरकारी दुकान में तब्दील होते शिक्षा के मन्दिर




शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले देश के विश्वविद्यालयों को सरकारी दुकान में तब्दील करने की साजिश और गति पकड़ रही है ... छात्र आन्दोलन की जमीं कहे जाने इलाहाबाद के पत्रकारिता विभाग के विद्द्यार्थियों उठाई है इसके खिलाफ आवाज़ ...

बहुत दिन बाद कुछ जिन्दा रहने की खबर मिली. बाज़ार में बिकते शिक्षा को बचाने की जो मुहिम इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों ने चलायी है. उससे देश में आम नागरिक के शिक्षा पर अधिकार की नयी आशा जागी है. अगर समय रहते ऐसे आन्दोलन नहीं किये गए तो देश के अमीरजादे गरीब लोंगो को देश की मुख्य धारा में आने का सपना तोड़ देंगे. पिछले दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के समांतर एक स्ववित्तपोषित पत्रकारिता कोर्स खोलने का विरोध बड़ी तेजी से आगे गति पकड़ रहा है. यह विरोध न सिर्फ एक कोर्स को बचाने का है बल्कि पत्रकारिता में उस परंपरा को जीवित रखने का भी है जो व्यवस्था के खिलाफ की पत्रकारिता रही है. बाज़ार ने शिक्षा के साथ मीडिया को पंगु और अमीरों के हाथ की कठपुतली बनाने का जो खेल रचा है उसके प्रति ये विरोध शुरुआत हो सकती है लेकिन ये आने वाले दिनों के लिए एक बड़े जन आन्दोलन की पृष्ठभूमि साबित होगी। हमें लोकतंत्र बचाना है तो शिक्षा और पत्रकारिता दोनों को बाजारीकरण से बजाना होगा. तभी देश का आखिरी आदमी भी देश के सबसे बड़े पद पर जाने का अपना सपना पूरा कर सकता है. पत्रकारिता ने देश के आजादी की लडाई लड़ी तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने देश को छात्र आन्दोलन के जरिये नयी राजनीतिक दिशा दी. अब पत्रकारिता का छात्र राजनीती के गढ़ के साथ फिर मेल हुआ. सच मानिये वक्त भले लगे, मगर शिक्षा के इस बाजारीकरण की मृत्यु तय है.

शनिवार, ५ सितम्बर २००९

मशीन ने हार मान ली


मशीनें जिंदगी बन गई हैं

और जिंदगी मशीन

हर मशीन की जाहोती है

जिंदगी की हथेली पे

मशीन ने भी सिखा जिंदगी से

जान का सौदा करना

और अब दोनों प्रतिस्पर्धा करते हैं

जान लेने का

कौन किसकी कितनी जल्दी

जान ले सकता है

मशीन ने हार मान ली

जिंदगी को जिंदगी मारने की गति देखकर




गुरुवार, ३ सितम्बर २००९

घुटन, दर्द और चीख न पाने की पीडा ...


घुटन, दर्द और चीख न पाने की पीडा ... ये दर्द आज हिंदी भाषी के लिए कहीं से कम होता नजर नही आता, आज सुबह ही एक मित्र से बात हुई। वह एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से परास्नातक है और भारत एक प्रतिष्ठित जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता में परास्नातक उपाधि पत्र प्राप्त है .... वह देश के एक सम्मानित विश्वविद्यालय से एम फिल करना चाहता था और उसने अपनी भाषा में ही लिखित परीक्षा पास कर ली थी. साक्षात्कार में वह चयनित नहीं हो सका ... उसका आरोप है की उसे अंग्रेजी में दक्षता नहीं हासिल होने के कारण उसका चयन नहीं हुआ है ... यह सही या गलत ... लेकिन देश के एक वृहद् भाषा भाषी के मन में इस तरह के विचार हैं ... निश्चित रूप से बहुत कुछ गलत चल रहा है ... और ये पीडा घुटन बनती जा रही है ... पता नहीं ये घुटन कितने भारतीयों को पल पल प्रताडित कर रही है ... इस पर विचार करने की नहीं ... आन्दोलन करने की जरुरत है ... ताकि इस भाषाई घुटन को ख़त्म किया जा सके.

मंगलवार, २५ अगस्त २००९

चलो किताब ही जलाएं


चलो चलें दुनिया को विकास समझाते हैं
वापस लौटकर इतिहास का बाज़ार लगाते हैं
बन गये हैं इन्सान इस पर सवाल उठाते हैं
कोई हमें दिखाए सच का आइना
उसे लात दो और चार लगाते हैं ...
उठे अपने तरफ कोई उंगली
तोड़ उंगली उसे ताकत का एहसास कराते हैं
मिलते नहीं विचार तो क्यों समझें समझायें
रास्ते से हटाकर क्यों न आगे बढ जाएँ
आखिर दुनिया है तानाशाहों की
क्यों न किताब पर बंदिश लगायें
फिर भी बाज न आये जनता तो
चलो किताब ही जलाएं
और फिर लोकतंत्र की जय हो
...चलो नारा लगायें ...

गुरुवार, २० अगस्त २००९

सच का बाज़ार


सच का बाज़ार लगा
लगा झूठ का दाम
बिक गयी इंसानियत
हो गया खून रिश्तों की लिहाज का ...
हर रिश्ता खोजे अब सच्चाई अपने रिश्ते की
नहीं रहा भरोसा खून का
हर मांग में दिखने लगा अब धोखा ही धोखा
आखिर बाज़ार ने फेंका ऐसा पांसा
पैसे के आगे नंगा हुआ
झूठ के लबादे में रिश्तों को चलाने का सुख
परिवार को बनाये रखने का सुकून
दूसरों को जिलाए रखने का यकीं
सच अच्छा होता है
सच महान होता है
लेकिन सच ये भी है
झूठ की सच्चाई
सच से भी महान होती है
क्योंकि ये लोंगो को
इन्सान बनाये रखती है
जिंदगी को जिलाए रखती है
और हर किसी की ख़ुशी के लिए
नए नए शब्द
और नए रस्ते तलाशती रहती है ....

मंगलवार, १८ अगस्त २००९

देश का अपना रेत
फिसले हाथ से खेत
खेती छोड़ी घर छोड़ा
नौकरी हो गई
जीवन की रेख ...
खुशियाँ गई
आजादी खोयी
पैसें के सपनों में
बेचा सम्मान
फिर भी अफसोस है
आज पहली तारीख है
खुश है जमाना
कैडबरी खाकर
अपना मन मारता है बच्चा
एक तुकडे गुड के लिए ....

बुधवार, २९ जुलाई २००९

खाद्य कीमतें और उर्वरक की साजिश


आज बात दूसरी हरित क्रान्ति की चल रही है। यह जरूरत ऐसे समय में मुखर हुई है, जब पूरा विश्व खाद्य कीमतों की बढ़ती समस्या से जूझ रहा है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विश्व खाद्य संगठन ने बकायदा एक रिपोर्ट जारी कर बढ़ती खाद्य असुरक्षा और भूखमरी पर चिंता जाहिर की है। केवल 2007 में ही वैश्विक खाद्यान्न की कीमतों में करीब 50 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है और पिछले कुछ वर्षों में चावल की कीमतें 70 फीसदी से अधिक हो गयी हैं। एक आकलन के मुताबिक पिछले 30 वर्षों के दौरान खाद्यान्न कीमतों ने अपना उच्चतम स्तर छू लिया है। आलम यह है कि विश्व में करीब दस करोड़ लोग भूखमरी से जूझ रहे हैं तो लगभग 85 करोड़ के आसपास क्रानिक भूख की चपेट में हैं। इस वैश्विक आकलन से भारत की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है, जहाॅं करीब दो तिहाई आबादी रोजाना 20 रूपये के आय पर गुजारा करने को मजबूर है। सबसे अधिक विचलित करने वाली तस्वीर यह है कि आजादी के बाद दूसरी पंचवर्शीय योजना तक गैर-खाद्यान्न के मुकाबले खाद्यान्न उत्पादक भूमि का हिस्सा जहाॅं तीन चैथाई था, वहीं दसवीं पंचवर्षीय योजना तक पहुॅंचते-पहुॅंचते यह घटकर दो तिहाई के करीब रह गया। ऐसे में बढ़ती आबादी के लिए खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करना सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरा है। जिसके लिए भारत में हरित क्रान्ति के जनक एम एस स्वामीनाथन ने दूसरी हरित क्रान्ति को जरूरी बताया है। लेकिन जिस तरह खाद्यान्न फसलों की खेती का हिस्सा घट रहा है और व्यवसायिक फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है, उससे इस नतीजे पर पहुॅंचना जल्दबाजी होगी कि दूसरी हरित क्रान्ति, पहली की तरह क्रान्तिकारी होगी। अगर मान भी लिया जाय कि उन्नत किस्म की तकनीकी के साथ उन्नत उर्वरक का प्रयोग कर बढ़ती जनसख्या के लिए खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ा लिया जायेगा तो यहाॅं महाराष्ट्र के हिंगोली का उल्लेख जरूरी है, जहाॅं पुलिस के संरक्षण में उर्वरक के वितरण की नौबत आ गयी। बात इतनी ही नहीं है, नान्देड़ और अंकोला में किसानों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को लाठी चलानी पड़ी। कर्नाटक में इसी तरह के एक मामले में पुलिस की गोली से एक किसान की मौत हो गयी। इससे भी बड़ा सच यह है कि कुल आवश्यकता का मात्र 40 फीसदी उर्वरक ही किसानों के लिए अपलब्ध है। यह हालात तब है, जबकि भारत विश्व में नाइट्रोजन उर्वरक के उत्पादन में अमेरिका और चीन के बाद तीसरा स्थान रखता है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला तो यह कि कृषि उपज की मुनाफाखोरी में निजी कंपनियां तेजी से सक्रिय हुई हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि खाद्यान्न फसलों की अपेक्षा व्यवसायिक फसलों के लिए उर्वरकों की कालाबाजारी बढ़ी है। यह सब निजी कंपनियां अपने उर्वरक आउटलेट के जरिये कर रही हैं। जिसके चलते उर्वरक आयात वित्त वर्ष 2005-06 के मुकाबले 2006-07 में दोगुने से ज्यादा हो गया है। आयात किये जा रहे उर्वरक पर भी निजी कंपनियों का नियंत्रण है, जिससे ये काफी महगें पड़ रहे हैं। दूसरी तरफ बढ़ती तेल कीमतों ने भी उर्वरक के दामों में तेजी लायी है। इससे आम किसानों की मुश्किलें बढ़ गयी हैं। उर्वरकों पर दी जा रही सब्सिडी का लाभ भी आम किसानों के बजाय बड़े किसानों और व्यवसायिक फसलों की खरीद-फरोख्त में लगी निजी कंपनियों को मिलता है। सब्सिडी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि सब्सिडी उर्वरक उत्पादकों को दी जाती है न कि खेतिहरों को। अगर सब्सिडी सीधे खाद्यान्न उपजाने वाले छोटे किसानों को दी जाय तो किसानों का तो भला होगा ही साथ में खाद्यान्न समस्या को सुलझाने की दिशा में कदम बढ़ाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि बजट 2008-2009 में सब्सिडी का कुल भार 50204 करोड़ रूपये निर्धारित किया गया। जो पिछले बजट के मुकाबले 24500 करोड़ रूपये अधिक है। इसके बावजूद भारत में प्रति व्यक्ति उर्वरक की खपत 105 किलोग्राम है, जो विकासशील देशों की ही अपेक्षा बहुत कम है, जब कि पिछले 25 वर्षों में रासायनिक उर्वरक के उत्पादन में करीब चार गुना की बढ़ोत्तरी हुई है। हालांकि उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने जनवरी 2007 में फर्टिलाईजर मानीटरंग सिस्टम का गठन किया है। इसके जरिये विभिन्न राज्यों में जिला स्तर तक उर्वरक के वितरण को सुनिश्चित करने का कार्य किया गया है। इसके बाद छोटे किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए प्रखण्ड स्तर पर डीलरशीप नेटवर्क को विस्तारित किया जा रहा है। इसके साथ ही सरकार अक्टूबर 2006 से लागू नई मूल्य नीति - स्टेज - 3 के तहत उर्वरक को प्रखण्ड स्तर तक ले जाने में आयी लागत को भी मुहैया करा रही है। सरकार ने निर्णय लिया है कि उर्वरक उत्पादक और आयातक को सब्सिडी तभी दी जायेगी, जब राज्य प्रखण्ड स्तर तक उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित कर लेंगे। लेकिन सवाल यह है कि सरकार की सब्सिडी का लाभ किसको मिलने वाला है। कागजों में यह भले ही आम जनता के लिए हो, लेकिन जिस तरह खेती का व्यवसायिकरण हुआ है और निजी कंपनियां इसमें अपनी पंूजी लगा रही हैं। उससे किसानों के भविष्य के साथ-साथ खाद्यान्न की समुचित उपलब्धता पर भी सवाल उठने लगा है। अब यह जरूरी हो गया है कि उर्वरक उत्पादकों के स्थान पर खाद्यान्न उपजाने वाले किसानों को सीधे सब्सिडी दी जाय। इससे न सिर्फ खाद्यान्न की समस्या का सामना किया जा सकेगा बल्कि खाद्यान्न उपजाने को प्रोत्साहन भी मिलेगा। भारत के लिए एक सच यह भी है कि कृषि योग्य भूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा छोटे-छोटे जोतों में बंटा है, ऐसे में तकनीकी का चाहे जितना विकसित रूप लाया जाय, निश्चित रूप से मॅंहगा पड़ने के कारण अव्यवहारिक साबित होगा। इसलिए जरूरी यह भी है कि बड़े जोत वाले किसानों को उर्वरक पर सब्सिडी तभी दी जाय, जब वे खाद्यान्न का उत्पादन करें। उर्वरक पर अनिवार्य सब्सिडी खाद्यान्न उपजाने वाले छोटे किसानों को ही मिलनी चाहिए, न कि व्यवसायिक खेती करने वाले बड़े किसानों या उर्वरक की कालाबाजारी में शामिल निजी कंपनियों को। आज आलम यह है कि अन्न की आसमान छूती कीमतों के चलते विश्व की एक बहुत बड़ी आबादी दो जून की रोटी से महरूम हो रही है तो दूसरी तरफ खेती योग्य भूमि पर उर्जा पैदा करने वाले कृषि उत्पादों की खेती दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। अब यह सरकार को तय करना है कि हमारे लिए उर्जा ज्यादा जरूरी है या खाने के लिए अन्न।

भाषा का अपराध और आपराधिक भाषाभाषी

वह लेख जो जनसत्ता में नहीं छपा

अंग्रेजी क्यों जीती हिन्दी क्यों हारी, जनसत्ता, 5 जून 2008, राजकिशोर ने अपने लेख के जरिए बहुत उपकार किया है, हिन्दी समाज पर। आखिरकार उन्होंने हिन्दी समाज की आॅंखें खोल ही दीं। लेकिन बहुत देर कर दी उन्होंने। इतने गूढ़ ज्ञान को उम्र के इस पड़ाव पर आकर सार्वजनिक किया। अब तक तो हिन्दी की भावुकता में आकर करोड़ो प्रतिभाएं अपना जीवन बरबाद कर चुकी हैं। उनका तो जीवन ही व्यर्थ हो गया। वे किसी के काम ही न रहे। वे तो बोझ हो गये देश पर। आखिर वे उनके बेटे की तरह डाॅन बाॅस्को स्कूल में जो नहीं पढ़े। अब वे कैसे ब्रिटेन की एक प्रसिध्द ब्राॅडकास्ंिटग संस्था में काम करेगें। देश की लाखों बेटियों के पिता अपनी बेटी को हिन्दी स्कूल में पढ़ाने की गलती न सुधार पाये। अब उनका राजकिशोर की तरह कोई पत्रकार मित्र जो नहीं था। इसलिए वे गोबर रह गयीं। कहीं काम लायक न रहीं। स्नातक और परास्नातक कर देश पर भार हो गयी क्योंकि वे अंग्रेजी नहीं जानती या सीधे शब्दो में कहें तो अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढ़ी। लेकिन ये गूढ़ ज्ञान, जो राजकिशोर उम्र के इस पड़ाव पर दे रहे हैं, उसे मेरा मित्र महज 25 की उम्र में दे रहा है। वह आजकल हिन्दी के एक चैनल में काम करता है। पहले उसकी जिद थी कि वह हिन्दी के अख़बार में जायेगा, अन्ततः वह चैनल में जाने को राजी हो गया। एक दिन उसने बात ही बात में कहा कि हिन्दी घटिया और जरायम भाषा है। हद यह है कि जब उसने जरायम शब्द का इस्तेमाल किया तो उसे इसका मतलब तक मालूम नहींे था। मैनें उसे बताया कि जरायम का मतलब होता है आपराधिक। इस शब्द का प्रयोग औपनिवेशिक शासन के दौरान उन जनजातियों के लिए किया जाता था, जिन्हें सरकार पेशे से आदतन अपराध करने वाला मानती थी। उसने बड़ी ढिढ़ाई से कहा कि हिन्दी आपराधिक भाषा है, इसने न तो देश-समाज का कुछ भला किया है और न ही कर सकती है। उसने तर्क दिया कि यह संकीर्ण, संकुचित और राष्ट्रवादी भाषा है। मेरे मित्र के अनूसार जो इसकी पैरवी कर रहे हैं, वे संकीर्ण हैं और संस्कृति के नाम पर देश और समाज के साथ छल कर रहे हैं। मैनें अपने मित्र से जानना चाहा कि कोई भाषा कैसे अपराधी हो सकती है, भाषा तो साधन है, साध्य नहींे। यह जिस मानसिकता के तहत प्रयोग की जाती है, वह अपराधी हो सकती है। हम भाषा को कैसे अपराधी कह सकते हैं। इस सवाल के जवाब में मेरे मित्र ने जो तर्क रखे उसमें काफी दम है। उसने कहा कि हिन्दी भाशा में कितनी आसानी से कह दिया जाता है, क्या चमारों की तरह कपड़े पहने हो, क्या लड़कियों की तरह रो रहे हो, गंवार हो क्या, बिहारी कहीं के, च् च् च्...... चिंकी........। इसे भाषायी अपराध कहने से असहमत नहीं हुआ जा सकता, जिसमें जाति, व्यवसाय, लिंग, क्षेत्र इत्यादि के आधार पर भाषा का सामाजिक विकास किया गया हो। मैनें अपने मित्र से जानना चाहा कि क्या यह सिर्फ हिन्दी भाषा में है तो उसने कहा कि वह किसी और भाषा के बारे में नहीं जानता लेकिन हिन्दी इस अपराध से ग्रस्त है। सवाल यह उठता है कि अगर अन्य भाषाएं इस अपराध से मुक्त नहीं हैं तो हिन्दी अकेले कैसे अपराधी हो गयी। जहाॅं तक मैं जानता हॅंू, पूरे विश्व में नीग्रो गाली की तरह प्रयोग होता है और इसे पूरी तरह से नस्लभेद का मसला माना जाता है। यह उसी भाषा में होता है, जिस भाषा की पैरवी राजकिशोर और मेरे मित्र दोनों कर रहे हैं। यहाॅं कहने का आशय यह कत्तई नहीं है कि हिन्दी का यह चरित्र दोषपूर्ण नहीं है, जिसमें एक वर्ग को प्रताड़ित करने के लिए खास तरह की मानसिकता की भाषा का विकास किया गया है, लेकिन इसमें दोष हिन्दी का नहीं, उस मानसिकता का है, जिसके तहत अचेतन स्तर पर भाषा की इस साजिश को विस्तार दिया गया है। जरूरत उस मानसिकता को खत्म करने की है, भाषा को ही कटघरे में खड़े करने की नहीं। हिन्दी ही नहीं, जिस भी भाषा में इस तरह की मानसिकता है, उसकी खिलाफत होनी चाहिए। मैं अपने मित्र से कहना चाहूॅंगा कि अगर यह हिन्दी की भाषागत समस्या है तो इसे हिन्दी द्वारा ही दूर किया जा सकता है, किसी विदेशी भाषा को आयात कर इस समस्या से नहीं लड़ा जा सकता। समस्या उठाने के साथ-साथ उसका हल भी खोजना जरूरी होता है। मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि राजकिशोर के पास इस समस्या का कोई हल नहीं है कि जो बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने से वंचित रह गये, आगे उनका भविष्य क्या होगा। राजकिशोर का लेख पढ़कर बहूत से माता-पिता, अभिभावक और बच्चे हो सकता है कि सीख लें और अंग्रजी स्कूलों की शरण लें। लेकिन उनका क्या होगा, जो पढ़ाई की हद से आगे निकल चुके हैं। हिन्दी आती है लेकिन अंग्रेजी नहीं। लोकतंत्र की इस भाषायी अक्षमता की विडम्बना पर रोते बेचारे, एक हिन्दी लेखक द्वारा भी दुत्कार दिये गये। अब कहाॅं जांय और कैसे मुॅंह छुपायंे। इण्डिया में रहते हैं और अंग्रेजी नहीं आती। चूल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए, ऐसे नासपीटों को। इन्हीं की वजह से भारत की नाक कट रही है दुनिया में। तुच्छ और जरायम हिन्दीभाषी। एक बात राजकिशोर जी से जानना चाहूॅंगा कि अगर अन्य भारतीय भाषाओं को छोड़ भी दें तो क्या सारे हिन्दीभाषी बच्चों को अ्रग्रेजी स्कूलों में पढ़ाना संभव है। अगर सारे हिन्दीभाषी तय कर लें कि अब उन्हें पश्चिमी देशों, देश के अभिजात्य वर्ग और हिन्दी के एक प्रतिष्ठित लेखक की नजरों में अंग्रेजी जानकर तथाकथित रूप से उपर उठना है तो क्या आने वाले कुछ वर्षाें में उनकी पूरी की पूरी पीढ़ी को देश के उन 10 प्रतिशत लोगों के समकक्ष खड़ा किया जा सकेगा, जिनके प्रति उनका वही रवैया है, जो औपनिवेशिक शासनकाल में अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति था। देश के इस वर्ग ने अपनी झूठी सत्ता और प्रभुता को बनाये रखने के लिए औपनिवेशिक शासन की भाषा की गुलामी पूरे देश पर थोप दी। इस तरह से अंग्रेजों से आजाद होने के बाद भारत अपने ही देश के अंग्रेजीपरस्त लोगों का गुलाम हो गया। कभी इस गुलामी के खिलाफ संघर्ष करने वाले राजकिशोर को, आज अपना संघर्ष बेमानी नजर आने लगा है,क्योंकि उन्हें अपनी कमाई से ज्यादा बेटे की कमाई नजर आने लगी है और देश में किसानी करने वालों से ज्यादा चिंता विदेश में अंग्रजी के जानकार कमाइ्र्र करने वालों की होने लगी है। अब वह अपने बेटे में देश के आखिरी आदमी की छवि देख रहे हैं। जिस देश के करीब दो तिहाई लोग रोज 20 रूपया कमाने का ख्वाब देखते हैं,उन्हें राजकिशोर जी अंग्रेजी पढ़ाकर विदेश भेजने का स्वप्न बेच रहे हैं। राजकिशोर जी लगता है भूल गये हैं कि इस देश में अंग्रेजीभाषियों की जो तादाद करीब नौ करोड़ बतायी है, उसमें से महज सवा दो लाख लोग ही प्राथमिक तौर पर अंग्रेजी का प्रयोग करते हैं। बाकी के साढ़े छः करोड़ द्वितीयक और ढ़ाई करोड़ तृतीयक भाषा के तौर पर अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हैं। इसका मतलब है कि जो भाषा महज आधा फीसदी लोगों की भी आधिकारिक भाषा नहीं है, उस भाषा को 40 फीसदी से भी अधिक लोगों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा पर न सिर्फ तरजीह दी जा रही है, बल्कि उस पर शासित की जा रही है। अगर कुल नौ करोड़ लोगों को भी लें तो अंग्रेजी का प्रयोग करने वाले दस फीसदी का भी आंकड़ा नहीं छूते हैं। इस लिहाज से हिन्दी जानने और समझने वालों की संख्या दो तिहाइ्र्र से अधिक है। इस देश में बंगाली 8.3 फीसदी, तेलगू 7.8 फीसदी, मराठी 7.5 फीसदी, तमिल 6.3 फीसदी, उर्दू 5 फीसदी, गुजराती 4.8 फीसदी, कन्नड, उडिया और मलयालम 3-4 फीसदी, पंजाबी और आसामी 1-3 फीसदी के बीच प्रयोग करतेे है। कहने का आशय है कि अगर किसी भाषा का राष्ट्रीय स्वरूप है तो वह हिन्दी है। यही भाषा पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है। इसी के समन्वय भाषा के रूप में विकास से भारतीय भाषाओं को वास्तविक रूप में भारतीय अर्थ प्रदान किया जा सकता है। यही एक मात्र रास्ता है, जिससे शीर्ष पर विराजमान तथाकथित अभिजात्य और विद्वान लोगों की आंग्ल मानसिकता की शोषणकारी सत्ता को चुनौती दी जा सकती है। हिन्दी को भारतीय लोकतंत्र की व्यवहारिक और औपचारिक भाषा बनाये बिना लोकतंत्र अधूरा है। लोकतंत्र में जनता की भागीदारी बढ़ाने के लिए उसकी भाषा का होना जरूरी है, इसी के जरिए उन दस प्रतिशत लोगों को करारा जवाब दिया जा सकता है, जो भाषायी वंचना का फायदा उठाकर लोकतंत्र को अपनी बपौती समझने लगे हैं। अक्सर कहा जाता है कि अंग्रेजी विश्व भाषा है और इसके बिना वैश्विक प्रतिस्पर्धा का मुकाबला नहीं किया सकता। मैं ऐसा कहने वालों से पूछता हूॅु कि कितने प्रतिशत भारतीय वैश्विक हैं, महज एक प्रतिशत जिनकी तादाद न हो, उनके लिए अंग्रेजी में कामकाज को पूरे देश पर लादा जा रहा है। ऐसे लोगों को अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषा सीखने से मना कौन करता है। रही बात अंग्रेजी में पारगंत होने के कारण वैश्विक रोजगार मिलने की, जिस पर अक्सर भारतीय मीडिया इतराता है तो इसके भी आंकडे पर नजर डालने पर जो तस्वीर उभरती है, वह न सिर्फ रोजगार के लिहाज से महत्त्वहीन होता है बल्कि काम के लिहाज से भी उन देशों के लिए कम महत्व का होता है, जिसके लिए एक तरह से सस्ते मजदूरों की जरूरत होती है। जहाॅं तक चीन और जापान के युवाओं के अंग्रेजी की तरफ रूख करने का सवाल है तो इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि उनकी राश्ट्रीय नीति आज भी देश की भाषा को प्राथमिकता देती है। उनके यहाॅु अंग्रेजी के प्रति रूख करना व्यक्तिगत चुनाव है, राष्ट्र के भाषा नीति की विवशता नहीं। मुझे एक वाकया याद आता है, भारत के एक पूर्व विदेश सचिव हमारे कार्यालय में आये। मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी उनसे बात कर रहे थे। वे लगातार अंग्रेजी में बात कर अपनी विद्वता प्रदर्शित करने की कोशिश में लगे थे। गौर करने लायक बात यह है कि इस समय इग्लैंड में ही रहने वाले भारत के उस पूर्व विदेश सचिव ने मेेरे वरिष्ठ सहयोगी के हर बात का जवाब हिन्दी में दिया और अपनी हर बात हिन्दी में कही। मुझे लगाा जो देश में हैं उन्हें ही देश की कद्र नहीं है और जो हिन्दी के हैं, उन्हें ही हिन्दी की सुध नहीं है।

शनिवार, ४ जुलाई २००९


ये कहानी फिर चली

धन्धेबांजों ने दुनिया की तकदीर लिखी

धनवानों की दुनिया सजी

गरीबों ने फिर से अपनी मौत लिखी ...

निजीकरण की निजता


निजीकरण की आग ये ऐसी

सम्बन्ध निजी हो गये

इतने निजी की

समलैंगिक बन गये ....

मंगलवार, ५ मई २००९

अनुभव

अनुभव जीवन का अबूझ, अनजान, अनसुलझा

नित नए एहसास खुशी, गम, असमंजस, दुविधा

पशोपेश में मन हर पल

क्‍या सही, क्‍या गलत

सुलझा अनसुलझा।

पहचान, प्रतिष्‍ठा, सम्‍मान, अपनापन

दूरी, नजदीकी, पाना, खोना

जीत, हार, वार, तकरार

द्वेष, प्‍यार, इज्‍जत, बतमीजी

याद सब, फिर भूल कब।

उतार-चढाव, गिरना-सं‍भलना

निरन्‍तर प्रगति तो क्‍यों न चलना

चल चल की मीलों चलना

नित नए शब्‍दों को गढना।

ये शब्‍द जीवन का शब्‍दकोष

जिन से जीवन का सार सारा

ये शब्‍द ही अनुभव की परिभाषा

इस परिभाषा में ही जीवन सारा।

शनिवार, २५ अप्रैल २००९

मौन क्‍यों हैं हम

गरीबी, लाचारी बेबसी देखकर
मौन क्‍यों हैं हम

मजलूम पर हो रहे जुल्‍मों-सितम देखकर
मौन क्‍यों हैं हम

रिश्‍तों में कम होती मिठास देखकर
मौन क्‍यों हैं हम

घरों के दरम्‍यां उठती दिवारों को देखकर
मौन क्‍यों हैं हम

अपने में मरता इंसान देखकर
मौन क्‍यों हैं हम

नेताओं की मौकापरस्‍ती, मक्‍कारी, गददारी देखकर
मौन क्‍यों हैं हम

देश जलता देखकर
मौन क्‍यों हैं हम

जल रहा वजूद है अब
हम फिर भी मौन हैं

अगर मौन ही रहे तो अब भूचाल आएगा
नष्‍ट होगा देश और समाज जाएगा

मौन तोड अब हमें जवाब देना है
मां, मातृभूमि को हिसाब देना है .....

बुधवार, २५ मार्च २००९

चेहरों के फेसियल में

नाचो अब चुनाव के ताल पे
देश के ख्याल पे
और अपने भविष्य के सवाल पे
चिंता है आपकी
सरकार अच्छी लाना है
आप कर लो कुछ भी
नेताओं को देश मिल-बाँटकर खाना है
चुनें किसे
अजीब ये कश्मकश है
कह रहा है
एक तरफ़ पूरा परिवार
तेरे हाथ पर
मेरा है अधिकार
दूसरी तरफ़ नफ़रत की है राजनीति
जो बाँट रही है
धर्म को धर्म से
तोड़ रही है सम्बन्ध
जाति का जाति से
उठ चुकें है अंगारे अब चुनाव के
आहूत देनी है
जनता को
अपनी मेहनत की कमाई की
लगाई जा रही है जो
पार्टी की छवि
और नेताओं के चेहरों के
फेसियल में