सोमवार, 5 सितम्बर 2011

राजाओं का राज




एक जमाना था जब इस देश में सही में राज हुआ करता था। फिल्मों वाला राज नहीं, राजाओं वाला राज। उस समय देश था की नहीं, पता नहीं लेकिन राज्य जरूर थे। इसलिए उन पर राज हुआ करता था। इसलिए राजा और राजकुमार भी हुआ करते थे। वह राज्य आज की तरह बिलकुल नहीं थे। आज की तरह से मतलब आज की तरह के जनहितकारी जरा भी नहीं था। उस समय आज की तरह की ईमानदारी तो बिल्कुल नहीं थी। उस समय राजा से लेकर उसके सभी दरबारी और कर्मचारी भ्रष्ट थे। वे आज की तरह के पारदर्शी प्रशासन के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। उनके यहाँ हर फैसले बंद कमरे की बैठकों में लिए जाते थे। ये फैसले हमेशा धनी और ऊँचे तबके के हित को ध्यान में रखकर किए जाते थे। समान्य जनता से अधिक से अधिक कर वसूल किया जाता था। राज्य के खजाने को भरने के लिए आम जनता के जरूरत के सामानों की कीमत हर तिमाही में बढाई जाती थी। इसके साथ ही भोग-विलास के सामानों की कीमत हर महीने कम की जाती थी।

इस तरह राजाओं के राज में आम जनता का बहुत बुरा हाल था। जनता को हर सरकारी सेवा के लिए घूस देनी पड़ती थी और निजी सेवा के लिए ज़रूरत से ज्यादा कीमत। न्याय पाना तो टेढ़ी खीर हो गया था क्योंकि सबसे ज्यादा अन्याय न्यायालयों में हुआ करते थे। दरबारी, अधिकारी और कर्मचारी मिलीभगत से जनता के लिए बनाई गयी योजनाओं के मदों का बंदरबाँट कर लिया करते थे। शिक्षा इतनी महंगी कर दी गयी थी कि समान्य जनता के वश की बात नहीं थी। शिक्षा का माध्यम केवल अमीरों और प्रभुत्व वर्ग वालों की भाषा थी। सरकारी कामकाज भी आम जनता की भाषा में नहीं होते थे। इसका फायदा पढ़ा-लिखा तबका उठाकर, आम जनता को बेवकूफ बनाता था। धनी लोग अपना व्यापार फैलाने के लिए राज्य की जमीन को जनता के कल्याण के नाम पर नि:शुल्क लेते थे। उन पर चिकित्सालय, औषधालय, विद्यालय, खेल परिसर इत्यादि बनाने और उनमें गरीब लोगों के नि:शुल्क सेवा का वादा करते थे। लेकिन ऐसे लोग बाद में अपने वादे से मुकर जाते थे तथा व्यापारिक प्रतिष्ठान की तरह धनी और सम्पन्न वर्ग के हित के लिए चलाते थे।

राजा के दरबारी किसानों की जमीन सरकारी योजनाओं पर के नाम पर अधिग्रहित कर लिया करते थे और बाद में उसे ऊंची कीमत पर व्यापारियों और उद्योगपतियों को बेच दिया करते थे। दरबारी अपना घर भरने के लिए सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन करते थे तथा भव्य आयोजन और राज्य की प्रतिष्ठा के बहाने राज्य के धन की आपस में ईमानदारी से बंटवारा करते थे। प्राकृतिक संसाधनो को तो मंत्री अपनी बपौती समझते थे तथा राज्य सेवाओं के लिए लाइसेन्स पाना सुविधा शुल्क के बिना संभव न था। यहाँ तक की एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने का आज्ञापत्र पाने के लिए भी कर्मचारियों की जेब गरम करनी पड़ती थी। अपने ही खेत या घर को अपना साबित करने के लिए शुल्क निर्धारित थे। किसी अपराध में फसाए गए बेकसूर के लिए खुद को निर्दोष साबित करने में उसकी पूरी जिंदगी खत्म हो जाती थी और बड़े अपराधियों तथा जनसंहार करने वालों की जगह राजदरबार में पक्की हो जाती थी। इसलिए राजाओं के समय में सही में राज हुआ करता था। आज की तरह उस समय छद्म राजा, महारानी और राजकुमार तथा राज नहीं हुआ करते थे और आज की तरह की लोकप्रिय और ईमानदार व्यवस्था भी नहीं हुआ करती थी।



बुधवार, 31 अगस्त 2011

अनुशासन

कई साल पहले की बात है एक स्कूल हुआ करता था। उस स्कूल में एक कक्षा लगा करती थी। उस कक्षा में शहर के केवल मनी और मसल पॉवर रखने वालों के बच्चे पढ़ सकते थे। उस कक्षा में पढ़ाने जाने की हिम्मत कोई शिक्षक नहीं करता था क्योंकि अक्सर बच्चे आपस झगड़ा किया करते थे, एक दूसरे से गालियों में बातें करते थे, वे शिक्षकों को कुछ भी कह दिया करते थे, आपस में जूता-जूता और चप्पल-चप्पल भी खेला करते थे, कभी-कभी तो पूरी कक्षा सर पर उठा लेते थे और जो शिक्षक उनकी नहीं सुनता था उसे कक्षा से बाहर अच्छी तरह से समझा देते थे।

एक बार कुछ आम छात्रों ने उनके विरोध का मन बनाया। सब एक मंच पर इकठ्ठा हुये और उनके इस व्यवहार की निंदा की। उन्हें अराजक, असभ्य और अमर्यादित कहा। कुछ ने उनके गतिविधियों की नकल कर उनकी आलोचना की। कुछ ने उन्हें जाहिल और गंवार कहा। कुछ ने उन्हें गैरजिम्मेदार बताते हुये उनको व्यवस्था के लिए घातक कहा।

इससे ताकतवर कक्षा में उत्तेजना फैल गयी। उन्हें लगा कि उनके प्रभुत्व को चुनौती दी गयी। उनके अधिकारों का हनन किया गया है। उनके गरिमा पर चोट की गयी है। वे सब एक दूसरे से लड़ते रहते थे लेकिन इस बाहरी आक्रमण के खिलाफ संयुक्त परिवार की तरह एक हो गए और तुरंत प्रधानाचार्य को सभा आयोजित करने को कहा और अपनी विशेष कक्षा की अवमानना के खिलाफ नोटिस दी तथा कड़ी कार्यवाही करने की मांग की। कुछ विद्यार्थी डर गए और उन्होंने माफी मांग ली। लेकिन कुछ अपनी बात पर अडिग रहे और उनके खिलाफ डटे रहे। ऐसे विद्यार्थियों को अनुशासन तोड़ने के अपराध में स्कूल से निकाल दिया गया।

बुधवार, 24 अगस्त 2011

जीवन को सिनेमा बनाना अपराध नहीं




सिनेमा सच का आईना होता है, सिनेमा यथार्थ का चित्रण होता है, सिनेमा समाज के बदलाव का जरिया होता है, सिनेमा कला और अभिनय का दस्तावेज़ होता है, सिनेमा केवल मनोरंजन के लिए होता है, सिनेमा समाज के लिए आदर्श होता है, सिनेमा लोगों के लिए संदेश होता है और न जाने कितने तरह के कथानक हम अपनी रोज की बहसों से खोज सकते हैं सिनेमा के बारे में। लेकिन इसमें से क्या कोई एक अकेला कथानक सिनेमा को परिभाषित कर सकने की क्षमता रखता है, इसका जवाब शायद भी हाँ में नहीं हो सकता क्योंकि इसका जवाब पूरा ना है यानि सिनेमा को हर कोई एक नजर से नहीं देखता है और सिनेमा देखने का मकसद एक दर्शक का दूसरे दर्शक से अलग होता है, फिर सिनेमा को हम कैसे परिभाषित कर सकते हैं? सिनेमा को हम उतने तरह का मान सकते हैं जीतने तरह का हम जीवन जीते हैं। जिस तरह का जीवन हम जीते हैं उस तरह के जीवन को सिनेमा बनाने को हम अपराध करार नहीं दे सकते हैं। कोई अगर किसी दुर्भावना से सिनेमा बना रहा है तो हम उससे असहमति रख सकते हैं और उसके प्रति अपना विरोध दर्ज कर सकते हैं लेकिन बिना देखे उस पर प्रतिबंध की मांग तर्कसंगत नहीं कह सकते, जैसा की पिछले दिनों प्रकाश झा की आरक्षण फिल्म को लेकर पूरे देश में प्रतिबंध का माहौल बनाने की कोशिश हुई। तीन राज्यों में यह कोशिश सफल भी हो गयी। मुझे भी डर था कि प्रकाश कहीं अपनी पिछली फिल्म राजनीति की अपरिपक्वता इस फिल्म में भी न दोहरा दें लेकिन मुझे और लोगों की तरह निर्णायक बनने की जल्दबाज़ी बिलकुल भी नहीं थी। मुझे आश्चर्य होता है जिस फिल्म में प्रकाश ने खुलेआम पिछड़े तबके के प्रतिभाशाली होने पर प्रश्नचिन्ह खड़ा किया था, उस पर किसी ने एक शब्द न तो लिखा और न ही एक शब्द विरोध का प्रकट किया। राजनीति में उन्होंने बड़े साफगोई से दिखा दिया कि पिछड़े घरों से राजनीति में जो नेतृत्व आता है वह कहीं न कहीं से बड़े और शाही घरानों का जूठन होता है। पिछड़े लोगों में नेतृत्व की प्रतिभा हो ही नहीं सकती बल्कि वह गलती से, भूल से, भटककर और कभी-कभी क्षणिक उन्माद में चली जाती है। आरक्षण में चाहकर भी प्रकाश वह रेखा पार नहीं कर सकते थे ,जो देश के संविधान ने खींची हुई थी। यह जानते हुये भी लोगों ने इस फिल्म पर प्रतिबंध की मांग की, जो कहीं से भी जायज नहीं थी। फिल्म में प्रकाश ने विषय के साथ या तो इंसाफ किया है या फिर उन्हें करने के लिए मजबूर होना पड़ा है क्योंकि उन्होंने जितने पूर्वाग्रहों का प्रयोग किया है, उससे ज्यादा की गुंजाइश ही नहीं बनती थी। फिल्म के अंत में वह एक समांतर संस्था की बात करते हैं जिसमें गरीब, पिछड़े और किसी भी जाति-धर्म के लोग नि:शुल्क पढ़ सकेगें। यही उनका सबसे बड़ा पूर्वाग्रह है, यहीं पर लगता है कि उन्होंने न तो भारतीय जाति व्यवस्था का सही से अध्ययन किया और न ही आरक्षण व्यवस्था का। वह आरक्षण की पूरी फिल्म का उन सतही बातों और तर्कों के साथ अंत कर देते हैं जो उत्तर प्रदेश और बिहार में रोज चाय और पान की दुकानों की होती हैं। प्रकाश को मालूम होना चाहिए था कि वे फिर से एक अलगाववाद की व्यवस्था का विकल्प दे रहे हैं। जब शैक्षिक स्तर पर ही वह अलगाव परोसने की सिफ़ारिश कर हैं तो आगे का क्या विकल्प देते? ऐसे लोगों के लिए नौकरियों का अलग विभाग लाते? गरीब और पिछड़ों को एक साथ खड़े करने का स्वप्न बेचना बहुत आसान है लेकिन उनको समाज में बराबरी का हक दिलाना बहुत मुश्किल है। एक गरीब सवर्ण को अपने जन्म की वजह से सामाजिक अलगाव का सामना नहीं करना पड़ता लेकिन एक अवर्ण को जीवन के हर मोड़ पर अपने इतिहास का बोझ ढोना पड़ता है। और प्रकाश दोनों को एक अलग समांतर संस्था में डालने की बात करते हैं। आखिर यह व्यवस्था मुख्य संस्था में क्यों नहीं हो सकती? पूरी कहानी का दोमुहाँपन यहीं उजागर हो जाता है एक तरफ वह तबेला कोचिंग सेंटर में समानता की बात करते हैं और दूसरी तरफ मुख्य शिक्षा व्यवस्था में धनी, सम्पन्न और उच्च वर्ग से अलग गरीब और पिछड़ों के लिए समांतर व्यवस्था की बात करते हैं। पिछड़ों को गरीबों के साथ जोड़कर वे आय के आधार पर आरक्षण का सांकेतिक समर्थन करते हैं लेकिन उन्होंने कभी सोचा या जानने की कोशिश की कि शिक्षा में सरकार आजादी के बाद से ही गरीबों को छात्रवृत्ति दे रही है और समाज में गरीबी दूर करने के लिए सैकड़ों परियोजनाएं चला रही है। जिस आरक्षण का विकल्प वह समांतर व्यवस्था सुझा रहे हैं, उससे आरक्षण की मुख्य वजह सामाजिक और शैक्षिक आसमानता नहीं दूर होने वाली। इसके लिए तो उन्हें समांतर अलग करने वाली नहीं बल्कि समाज में समान भागीदार और साथ बढ़ाने वाली व्यवस्था चाहिए। अब यह मकसद आरक्षण से पूरा होता हो तो आरक्षण दीजिये और किसी व्यवस्था से पूरा होता हो तो किसी और व्यवस्था के जरिये दीजिये।

उनके फिल्म का कथानक और उसका फिल्मांकन नि:संदेह जोरदार है। फिल्म के सभी पात्र और घटनाएँ बिलकुल हमारे करीब के और हमारे ही बीच के लगते हैं, इसमें मजे हुये अभिनेताओं की मौजूदगी फिल्म को निर्देशक के मनमुताबिक अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब होती है। कमजोर गीतों और धुनों के बाद भी फिल्म के संवाद फिल्म को कहीं से भी बोझिल नहीं होने देते हैं। शुरुआत एकदम जोरदार ढंग से होती है, जिसमें एक उच्च शिक्षण संस्थान प्रतिभा के बावजूद पिछड़े वर्ग के छात्र सैफ अली खान को उसके जाति और बैक ग्राउंड के आधार पर तौलने लगती है, पढ़ा लिखा वह नौजवान उनकी इस बेइज्जती को सहन नहीं करता और उनकी ही भाषा में उन्हें करारा जवाब देता है। इसे एक जोरदार दृश्य कह सकते हैं, जिसमें पूर्वाग्रह और अहंकार के बीच बदल रहे सामाजिक परिवेश को सीधे-सीधे परिभाषित किया गया है। सैफ अली खान जब अपने कॉलेज के प्रधानाचार्य अमिताभ बच्चन के पास आकर यह घटना बताता है तो वे कहते हैं कि उन्हें विश्वास नहीं होता कि वे सब इसी स्कूल में पढे हैं और उन्होंने ने उन्हें पढ़ाया है। यह एक और शुरुआती व्यंग है हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था पर कि हम पाठ्यक्रम के मुताबिक पढ़ाकर विद्यार्थियों को पास तो कर देते हैं लेकिन उन्हें शिक्षित नहीं कर पाते और भावी समाज के निर्माण के विजन तो बिलकुल नहीं दे पाते।

इसके बाद कहानी का घटनाक्रम तेजी से बदलता है। ये सब वही घटनाक्रम हैं जो हम सभी के आसपास कभी न कभी तेज या धीमे जरूर गुजरता है। न्यायालय का एक फैसला आता है और वह एक वर्ग को ज्यादा उत्साहित कर देता है तथा दूसरे वर्ग को कुछ ज्यादा ही निराश। अतिउत्साह और अतिनिराशा के इजहार से उत्पन्न संघर्ष ही फिल्म को आगे धकेलती है। सभी सरकारी संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण की उच्चतम न्यायालय की मुहर से लाभान्वित तबका जुलूस लेकर कॉलेज पहुँच जाता है और इसका विरोधी तबका उन्हें कॉलेज में घुसने नहीं देना चाहता। इनके बीच एक स्वार्थी तबका है जो इससे अपना हित यानि व्यवस्था को अपने हाथ में लेकर केवल पैसे वालों के हितों में काम करना चाहता है, इनका प्रतिनिधि है मनोज बाजपेई। ये हित जब आमने सामने होते हैं तो सारे हित एक तरफ नजर आते हैं और आरक्षण तथा उसका प्रतिनिधि सैफ अली खान एक तरफ। इसी आमने सामने में एक सवाल उठता है कि पिछड़े लोग मेहनत से इतना घबराते क्यों हैं, बराबरी के कम्पटीशन से इतना डरते क्यों हैं। उन्हें जवाब मिलता है बात अगर बराबरी के प्रतियोगिता की है तो शुरुआत की लाइन भी एक होनी चाहिए। सैफ वहाँ के सब लोगों को चैलेंज करता है कि पहले अपनी माँ को रोज सुबह उठकर बर्तन धोने के लिए भेजें, बहन को नगर निगम के दूर के नल से घड़े से पानी लेने के लिए भेजें और बाप को बोलें सुबह से शाम तक धक्के खाने वाली नौकरी करे फिर बराबरी के प्रतियोगिता की बात करें। वह उन लोगों को इतिहास भी याद दिलाता है कि पिछले 2 हजार सालों से मेहनत किसने किया है और उनके मेहनत के बल पर हराम की कमाई किसने की है? वह कहता है कि उनकी मेहनत से बनी व्यवस्था से उनके ही लोगों को सैकड़ों सालों से बाहर रखा गया और आज हम बराबर आना चाहते हैं तो यहाँ के हर तंत्र पर बैठे आप के लोग हमें बाहर का दरवाजा दिखाने में लगे हैं। यह आरक्षण हमारे लिए दरवाजे खोल रहा है तो सबको लगता उनके खिलाफ अन्याय हो रहा है। इस घमासान का परिणाम फिल्म को दुखांत बना देती है। अमिताभ पर पक्षपात करने, जातिवादी होने, आरक्षण के विरुद्द होने, आरक्षण के साथ होने जैसे अलग अलग तरह के आरोप लगते हैं। आरक्षण के खिलाफ रहे एक छात्र को कॉलेज से निकाल दिया जाता है, सैफ शोध के लिए अमेरिका चला जाता है, अमिताभ एक अखबार संवादता के को दिये बयान में फंस जाते हैं और उन्हें इस्तीफा के साथ अपने घर से भी हाथ धोना पड़ता है। इन सबसे फायदा उठाता है पूँजी के लिए काम करने वाला मनोज बाजपेई, जिसके केके कोचिंग पर लगाम कसने की कोशिश की थी अमिताभ ने। इसके बाद पूरी फिल्म शिक्षा के बाजरीकरण पर आकर खड़ी हो जाती है। केके कोचिंग की चुनौती और अपने घर को पाने के लिए अमिताभ तबेला कोचिंग शुरू करते हैं और उनकी इस मुहिम उनका साथ देता है हर वह इंसान जो उनसे जुड़ा होता है। अपने रात दिन के परिश्रम से वह साबित कर दिखा देते हैं कि सच्ची शिक्षा के सामने कोई आरक्षण और कोई बाजार नहीं टिक सकता है। इस तरह उन्होंने अपने लगाए पौधों की बदौलत केके कोचिंग के तबेला कोचिंग को गिरने के मंसूबे को तो ध्वस्त कर देते हैं लेकिन वह न तो शिक्षा के बाजारीकरण को रोकने का उपाय बता पाते हैं और न आरक्षण का कोई तर्कसंगत विकल्प दे पाते हैं। इस तरह से यह फिल्म समाज में मौजूदा चल रही उच्च शिक्षा की समस्याओं और विचारधाराओं के विभिन्न पक्षों का जोरदार फिल्मांकन है। हमें फ़िल्मकार के ऊपर विकल्प या संदेश देने का दबाव नहीं बनाना चाहिए और न ही उसके दिये गए विकल्प को आखिरी सत्य मानना चाहिए। अगर हम उसके विकल्प से सहमत हैं सहमति व्यक्त करनी चाहिए और असहमत हैं तो असहमति व्यक्त करनी चाहिए लेकिन दोनों ही हालातों में कम से कम ऐसे आसाधारण विषय पर शानदार फिल्म बनाने की काबलियत को कम से कम एक बार सलाम जरूर करना चाहिए।


शनिवार, 20 अगस्त 2011

कविता क्या है ...



कविता जीवन का नाम है,
कविता रोटी के लिए संग्राम है,
कविता न्याय की लड़ाई है,
कविता बेवफ़ाई है,
कविता नया रचने की ललक है,
कविता आकाश में उड़ने का फ़लक है,
कविता प्यार की पहली पाती है
कविता महिलाओं के लिए आज़ादी है
कविता माँ का दूध है
कविता महाजन का सूद है
कविता बच्चे का जनम है
कविता बेटी का गबन है
कविता दहेज है
कविता फूलों की सेज है
कविता सुबह की पहली अंगड़ाई है
कविता भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई है
कविता प्रियतमा की मुस्कान है
कविता प्रेमी की जान है
कविता पहला गुलाब है
कविता चलती क्लास में देखा गया ख्वाब है
कविता लड़की का पकड़ा गया हाथ है
कविता एक अज़नबी का साथ है
कविता बारिश में भीगना है
कविता दारू पीकर गिरना है
कविता गिरकर संभलना है
कविता सूरज का निकालना है
कविता किसी का इंतजार है
कविता आने वाली बहार है
कविता याद है
कविता रात है
कविता किसी के लिए आस है
कविता मेरे लिए प्यास है।




बुधवार, 17 अगस्त 2011

चमकी रो उठी फिर से

चमकी रो उठी फिर से
महज दो निवाले के लिए
रोटी हो, भात हो
या थोड़ी सी सब्जी हो
या सब्जी जैसी घास हो
कुछ न सही
चावल की मांड ही हो
बड़ा अजीब है
उसे दूध नहीं चाहिए
बड़े बड़े दुकानों में
वह गयी ही नहीं
प्रोटीन और विटामिन से भरपूर
उत्पादों के बारे में सुना भी नहीं
चौराहे पे लगे फलों को देखा
अपने ललचाते मन से
निगाहें माँ के चेहरे पर की
और हिकारत से फलों को देखा
फिर पकड़ माँ की उँगली
घर चल दी
घर क्या होता है
चमकी को मालूम नहीं
उसके लिए ईंटों की बेतरीब जोड़ पर
पुआल से बना छप्पर ही
घर है
स्कूल के बारे में
उसने केवल सुना भर है
वह भी तब
जब गाँव गयी थी
उसके लिए स्कूल वह है
जहाँ दोपहर को
पेट भर खाना मिलता है
शहर में उसके लिए
कोई स्कूल नहीं
इसलिए उसके लिए
पेट भरना दूर की बात है
कपड़े नए भी होते हैं
कपड़े खरीदे भी जाते हैं
इसका अहसास भी नहीं उसे
कपड़े मिट्टी से साफ होते हैं
गंदे नहीं
जाना है उसने
अपनी माँ से यही
वह देखती है
टकटकी लगाए
आती जाती गाड़ियों को
रेलों को और
आसमान में उड़ते यान को
ये सब उसके समझ से परे हैं
माँ कुछ कुछ समझती है
लेकिन वह समझा कर
उसे बहकाना नहीं चाहती
वह सोचती है क्या समझाए
यह कि क्यों नहीं जल पाता है
रोज रोटी के लिए चूल्हा
या यह कि क्यों नहीं आ पाते
उसके पापा घर हर रोज
कि यह कैसे औरों के घर में
पकता है इतना खाना
यह कि कैसे भर लेते हैं
जानवर तक अपना पेट
और चमकी के लिए
नसीब नहीं होते हैं दो कौर।





मंगलवार, 16 अगस्त 2011

नई लड़ाई होनी चाहिए

कहानी मोड़ पर है
कहानी छोर पर है
अब तो कहानी
सब ओर है
कौन है रहनुमा
और सरकार कौन है
बात जब चली है तो
दूर तलक भी जानी चाहिए
किसके रंगों में
बह रहा खून गुलामी का
बात ये भी सामने आनी चाहिए
अब तक लड़ी गई
हर लड़ाई आज
अर्थ अपना है खो चुकी
बस बात इतनी सी है
नए सिरे से
नई लड़ाई होनी चाहिए
अंजाम हो कुछ भी
कहानी नए सिरे से
शुरू होनी चाहिए।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

आंदोलन “आज” एक जरूरत है!



उजालों की लड़ाई में
अँधेरों की शिनाख्त
उजाला अंधेरे को
दिन में बदलने को व्याकुल
अंधेरा उजाले को
लील जाने को आतुर
फैसला किस्मत का नहीं
इंसानी हौसले का होगा
ऊँट बैठे चाहे जिस करवट\


ये लड़ाई केवल
गरीबी मिटाने की तो नहीं
ये लड़ाई केवल
भ्रष्टाचार खत्म करने की भी नहीं
लड़ाई तो ये इंसानी हौसले की है
इंसान कैसे बचा पाता है
इंसान होने का अपना हौसला


शायद इन्हें और दरकार हो
सरकारी गोलियों की
शायद और खाने की भूख हो
पूलिस के लाठी और डंडे
अभी और इंतजार है इन्हें
अपने बसे बसाये
जंगली आशियाने के उजड़ने का
अभी और सह सकते हैं ये
अपने ही देश में
अपने ही लोगों का जुल्म


क्योंकि विकास की नींव में
चुपचाप समा जाना
इनकी नियति है
और हमारी रोज-रोज बढ़ती
जीडीपी को ऊपर, और ऊपर
चढ़ाने की भूख
जंगलों को चिमनियों में
खेतों को सड़कों और कारखानों में
नदियों और समुद्रों को
व्यापार के तश्तरीखाने में
बदलती जा रही है


और बदलता जा रहा है
हमारे लिए
हमारे हक का मतलब भी
अपने ही देश में हम
नौकर और मजदूर हो गए हैं
अपने ही शासन में
खो अपना वजूद गए हैं
राजा अभी भी हैं वही
जो पहले से राज करते आ रहे हैं
देश को गुलाम बनाने वालों का
साथ देते आ रहे हैं
बस राजा बनने के तरीके
बदल गए हैं


फर्क बस ये है कि
देश को लूटने के तरीके
नए ईजाद हो गए हैं
यह लोकतन्त्र की राजशाही का नमूना है
अमीरों को बनाया और अमीर
गरीबों के मुँह से छिना निवाला है
कैसे कहें हैं हम आजाद
जब पढ़ाई हमारे यहाँ टेंशन है
नौकरी ही जीवन दर्शन है
जीवन से सादगी दूर होती जा रही है
केवल दिखावे के नाम पर
जनता की करोड़ों की धरोहर
रोज स्वाहा की जा रही है


इस अत्याचार का
इस भ्रष्टाचार का
अंत नहीं दिखता
कुछ हो नहीं सकता
जब तक इसके विरोध में
आम इंसान खड़ा नहीं होता


ऐसे में आंदोलन एक जरूरत है
अपने ही चुने लोगों को
आईना दिखाने की सूरत है
अब और इंतजार नहीं करते
जहां हैं बस वहीं उठ खड़े होते हैं
एक नयी दुनिया का
मंत्र फूंकने चलते हैं।






शनिवार, 6 अगस्त 2011

खोजता हूँ खुद को

खोजता हूँ खुद को

हर उस जगह
जहाँ जहाँ मैं था
और जहाँ जहाँ
मैं होना चाहता था

आज मैं नदारद हूँ
खुद की अपनी ही
बनाई हुई अतीत की तस्वीर से
भविष्य के बुने हुये
अपने ही सपनों के इन्द्रधनुष से

पतिंगों के जलने में
दीपक का दोष नहीं होता
नाव का डूबना
लहरों के होश में नहीं होता
अपनी इस बरबादी का
खुद “मैं” गुनहगार हूँ

पहाड़ की तरह
काश खड़ा हो गया होता
शायद सपनों के अपने
आड़ बन गया होता
कुछ होता न होता
अपनी जिंदगी को तो
अपनी कह रहा होता।

मंगलवार, 15 मार्च 2011

जिंदगी कुछ और नहीं इंतजारखाना है




जब से नहीं कहीं आना जाना है

जिंदगी कुछ और नहीं इंतजारखाना है

मंदिर बनायें की मस्जिद

सोचते सोचते ये उम्र निकल गयी

सच का पता बहुत बाद में चला

जन्नत का असली रास्ता तो मैखाना है

आज फिर से इस मोड़ पर हूँ

किसी से मोहब्बत की जाये

मगर उन यादों का क्या करूँ

जिनका रोज दिल की गली में आना जाना है

बहुत दिन बाद गया था अपने घर

सोचा की घर का ही होकर रह जाऊँ

पता सच का चला तो कदम वापस हो लिए

वजूद अपना बस दौलतखाना है

पढ़ने का मन अब भी बहुत करता है

स्कूल होकर आया

तब से मन में बहुत सन्नाटा है

वहाँ भी खरीदने-बेचने का लगा तांता है

दिल में कसक सी रहती है

समाज के कुछ काम आया जाए

कदम उठाए तो वापस खींचने पड़े

खुद के उनके ख्वाब बड़े वहशियाना हैं

उसका ख्याल आया तो

शरीर का कतरा-कतरा निचुड़ गया

आखिर क्यों मैं इतना बेमुर्वत हो गया

ख्वाब तो उसको हर हाल में पाना था

सोमवार, 15 नवम्बर 2010

भ्रष्टाचार आज का पवित्र त्योहार


बेईमानी की आई बयार

भ्रष्टाचार आज का पवित्र त्योहार

खाके कसम हर कोई रिश्वखोरी की

करता अपने काम की शुरुआत

माना रोग ये नया नहीं

लेकिन ये बढ़ता ही गया

गरीबों की जेब खाली करता गया

की इसकी ज्यों-ज्यों दवा

देश के लोगों के लिए

चाहे निवाला जुटाना हो

या रक्षा के लिए उनकी

खरीदने हों हथियार

फ़ौजियों के लिए वर्दी की बात हो

या मरने के बाद

उनके ताबूत का हो सवाल

चाहिए ऊपर से नीचे तक

सबको अपना अपना हिस्सा

बेईमानी की आई बयार

भ्रष्टाचार आज का पवित्र त्योहार

चारा पशुओं का भी नहीं छोड़ा

संसद में सवाल पूछने तक के लिए

खाते में धन जोड़ा

दूरसंचार से कमाया गया धन

यूरिया से भी उगाई गई

बेईमानी की फसल

हर तरफ बह रही है

रिश्वत की गंगा

बहन की शादी के बोझ तले

बेरोजगार भाई ने चुना फांसी का फंदा

बेईमानी की आई बयार

भ्रष्टाचार आज का पवित्र त्योहार

हवाला है अब कारोबार

शेयर है नाजायज कमाई का औज़ार

रियल स्टेट में लगा के पैसा

लगाओ बेईमानी की संपत्ति का अंबार

इतने सस्ते में बिक रहा आजकल ईमान

हजारों का नौकर

खेल रहा है करोड़ों और अरबों में

अपने खुद के खेत का मालिक

जी रहा है

बधुवां मजदूर से भी बदतर हालत में

बेईमानी की आई बयार

भ्रष्टाचार आज का पवित्र त्योहार

विश्वसनीयता का स्टैम्प भी हो गया

फर्जीवाड़े का शिकार

घोटाले का आदर्श है इतना बढ़ गया

देश की सीमा पर लड़ने वालों के नाम

करें नेता और अधिकारी राज

ऐसे फैल रहा इनका राज

नहीं है खड़े होने की जगह शहरों में

शहरों को खड़ा करने वालों के लिए

लोगों को दे के छत और नींद

ढूढें खुद के लिए दो मुट्ठी जमीन

बेईमानी की आई बयार

भ्रष्टाचार आज का पवित्र त्योहार

देश का सम्मान बढ़ाना

मतलब अपना-अपना धंधा चमकाना

गुलामी के आज के आलम में

यही है सबसे बड़ा त्योहार

गुलामीं को संजोएं

और आजादी को खोयें

क्वींस बेटन कंधो पर लेकर

गाँव-गाँव गली-गली ढोयें

बेईमानी की आई बयार

भ्रष्टाचार आज का पवित्र त्योहार

खेलों में सबसे बड़ा खेल

नाम है इसका कॉमनवेल्थ

नाम पर इसके

चारों तरफ से लिया कॉमन को लूट

भर दिया घरों में उनके

विकास का ठूंठ

खेल के इस खेल से

अब हर कोई घबराता है

फिर हो कॉमनवेल्थ

बार-बार दोहराता है

बेईमानी की आई बयार

भ्रष्टाचार आज का पवित्र त्योहार

खदान हो, आसमान हो या समुद्र से व्यापार हो

हर जगह घोटालों की अट्टाहस

करोड़ो-अरबों इनके हाथ का मैल

100 रुपये कमाने के लिए

आम आदमी सुबह शाम पेरा जाता है ऐसे

जैसे कोल्हू का बैल

स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, कोर्ट हो या कचहरी

बढ़ती है आगे गाड़ी यहाँ

नोटो के ज़ोर से

ईमानदारी पर चोट से

बेईमानी की आई बयार

भ्रष्टाचार आज का पवित्र त्योहार

सोमवार, 8 नवम्बर 2010

बड़े भाग्य हमारे ओबामा पधारे


बड़े भाग्य हमारे आप पधारे

भारत को कृतार्थ किया

इंडिया का उपकार किया

धरती डोले और मनवा गगन छू ले

चरणों में अपने हमरा मस्तक ले लें

बस यही तमन्ना है

भारत के शीश पर अपना वरद रख दें

इंडिया को बाहों में भर लें

हथियार दें हथियार दें

हमें और, और, और औज़ार दें

गांवों को लीलते शहरों की लड़ाई में

अनाज का संकट

भूखे भारत को इंडिया का दुश्मन बनाएगी

तुम्हारे इन्ही हथियारों से

रोटी की जंग लड़ी जाएगी

भाषा, संस्कृति और पहनावे की तरह

भारत, इंडिया से भूख की जंग भी हार जाएगी।

त्याग और बलिदान

हमारे एतिहासिक आदर्श हैं

इसके लिए अपनी पगड़ी तो क्या

छिनकर करोड़ों देशवासियों का निवाला

आपके हवाले कर देगें

हमारे लोग तो जन्मों-जनम से नंगे और भूखे हैं

भला इनकी बिना पर

सभ्य लोगों को हम बेरोजगार रहने देगें?

आप तैयारी करो

हथियार बनाओ

हम भी तैयारी करते हैं

देश के लोगों का निवाला छिनते हैं

जरूरत पड़ी तो

इन्हें हम आपके हथियार की गोली खिलाएगें

लेकिन आप रहें बेरोजगार

बर्दाश्त कैसे करेगें?

भारत को कृतार्थ किया

इंडिया का उपकार किया

बड़े भाग्य हमारे आप पधारे।

बुधवार, 3 नवम्बर 2010

मुझको मेरे पहचान ने मारा


मुझको मेरे पहचान ने मारा

भाषा और ईमान ने मारा

जिसकी उंगली पकड़कर चलना सीखा

आकाश दीप को रोशन करना सीखा

साथ से उसके अब जी घबराता है

पीछा छुड़ाने को सताता है

लगता है अक्सर यही

साथ में इसके

निकली दुनिया आगे

और मैं पीछे छूटा

मुझको मेरे पहचान ने मारा

भाषा और ईमान ने मारा

बड़ा दंभ था

बड़ा घमंड था

अपने ज्ञान का और

अपने विज्ञान का

सारा ज्ञान और सारा विज्ञान

सिमट गया बस भाषा में

अब तो लिखूँ कुछ भी

वह तो बस हिन्दी है

हो जाय उसका अनुवाद तो

इंडिया के माथे की बिंदी है

मुझको मेरे पहचान ने मारा

भाषा और ईमान ने मारा

चले गए अंग्रेज़

फिर भी रह गए अंग्रेज़

भाषा और आसन ही क्यों

दे गए काले-गोरे का भेद

किस गली से न गुज़रूँ

किस चौराहे पर न उतरूँ

अपने ही देश में

अपनी ही भाषा मुंह चिढ़ाती है

और अंग्रेजी दूर से ही

उपहास ड़ाती है

मुझको मेरे पहचान ने मारा

भाषा और ईमान ने मारा

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

गुलामी के इस दौर में


आज़ादी के मैदान में जिन्होंने लड़ी लड़ाई थी

वो मारे-मारे फिरते हैं

इस गाँव से उस गाँव में

इस जंगल से उस जंगल में

इस शहर से उस शहर में

फिर से लड़ते फिरते हैं

अपने हक़ के लिए

अपनी आज़ादी के लिए

और अपने देश को अपना कह सकने के अहसास के लिए

उन्हें फिर से दुत्कारा जाता है

हर उसी हक़ के लिए

जिसके लिए उन्होंने गोली खाई थी

सपनों की होली जलायी थी

घर में आग लगाई थी

इज्जत बचाने के लिए

बंदूक और तलवार तक उठाई थी

आज तो हो गया देश बेगाना

बस बनकर रह गया

उनका जिन्होंने गुलामी को ओढ़ा, बिछाया और पहना

आज वे आज़ादी को खा रहे हैं

आज वे आज़ादी को पी रहे है

और वही आज़ादी को जी रहे हैं

देश के लोग बैठकर अंधेरे में

अपने-अपने जख्मों को सी रहे हैं।

देश के विकास की रफ्तार बढ़ती ही जा रही है

यह रफ्तार ऊंचाई चढ़ती जा रही है

यह ऊंचाई जीडीपी की है

गगन से होड़ करते इमारतों की है

रोज खुलते नए मालों की है

बनते फ़्लाइओवर्स की है

देश की प्रतिष्ठा के नाम पर

जनता के धन से खेलने की है

और अपनी तिजोरी भरने की है

शहरों को रोशनी से नहलाने की इस मुहिम में

गाँव का दिया भभकने लगा है

शहर आगे और आगे बढ़ने लगा है

गाँव में हमारे घर में

कस्बे में आपके घर में

मुहल्ले में उनके घर में नजर आने लगा है

लेकिन घर से निकल कर देखो

हमारे गाँव, कस्बे और मुहल्ले में

जीवन घटने लगा है

पैदा होने वाला हर बच्चा शहरों की ओर मुँह करने लगा है।